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आज और अनुभव : मुंबई के हीरे को सूरत में चमकाने की तैयारी!

कविता श्रीवास्तव
सूरत डायमंड बोर्स हाल ही में शुरू हुआ है। यह हीरे के व्यवसाय का दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र बनने जा रहा है। यहां १५ मंजिलों की नौ अत्याधुनिक इमारतों में ४,२०० कॉर्पोरेट ऑफिसेज बने हैं। हीरे की अंतर्राष्ट्रीय खरीदी-बिकवाली, प्रदर्शनी, कस्टम क्लीयरेंस जैसी ढेर सारी सुविधाएं इसमें हैं। इससे पहले भारत में हीरे का सबसे बड़ा व्यवसाय केंद्र मुंबई रहा है। मुंबई में बीकेसी का भारत डायमंड बोर्स एशिया का भी सबसे बड़ा है और दुनिया में इसकी बड़ी प्रतिष्ठा है। इससे पहले मुंबई में ओपेरा हाउस की बहुमंजिला पंचरत्न इमारत और प्रसाद चैंबर्स हीरे के व्यवसाय का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। यहां हीरे का अंतर्राष्ट्रीय कारोबार वर्षों से होता रहा है। लेकिन अब काफी कारोबार बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (बीकेसी) में शिफ्ट हो गया है। मुंबई से ३८ बिलियन के जेम्स और आभूषण का निर्यात होता है। उसके बाद सूरत और जयपुर का नंबर आता है। वैसे विश्व में हीरे का सबसे बड़ा व्यापार केंद्र बेल्जियम के एंटवर्प में स्थित है, जबकि दक्षिण अप्रâीका और रूस में बड़े पैमाने पर हीरा उत्पादन होता है। भारत में मध्य प्रदेश के पन्ना में हीरे का खनन होता है, लेकिन भारत में हीरे तराशने का काम बड़े पैमाने पर गुजरात के सूरत में किया जाता है। ७० और ८० के दशक में एक वक्त था जब मुंबई में हीरा तराशने के सर्वाधिक कारखाने हुआ करते थे। हम मालाड की जिस बस्ती में रहते थे वहां की चालियों में घर-घर में हीरा तराशने के कारखाने थे और ढेर सारे मजदूर उसमें काम करते थे। ऐसे कारखाने आज भी मालाड, बोरीवली और दहिसर में हैं। लेकिन इनमें से अधिकांश सूरत शिफ्ट हो चुके हैं। १९९२ में मुंबई दंगों के बाद यहां से ढेर सारे कल-कारखाने अन्य शहरों में शिफ्ट हो गए। उसमें मुंबई से हीरा तराशने के हजारों कारखाने गुजरात में शिफ्ट हुए। रही सही कसर कोरोना ने पूरी कर दी और बचे-खुचे में से भी ढेर सारे मजदूर और कारखाने अब गुजरात चले गए हैं। मुझे याद आता है, जब ७० के दशक में मुंबई के उपनगरीय इलाकों में हीरा तराशने के कारखाने खोलने की होड़ सी मची हुई थी, तब ज्यादातर चालियों की बस्तियां हुआ करती थीं। उन चालियों में रहने वाले लोगों के मकानों के लिए प्रचलित दरों से कई गुना ज्यादा किराया देकर हीरा कारखाने वाले मांगते थे। उनमें मशीन लगा दी जाती थी और एक-एक कारखाने में २५ से ३० मजदूर इकट्ठे काम करते थे। उस दौर में हमने मुंबई में ढेर सारे हीरे तराशने के कारखाने देखे। गांव-गांव से लोगों को बुलाकर हीरा तराशने का कारीगर बनाया जाता था। हीरे के नन्हे से टुकड़े को कस कर पकड़ने की मशीन हुआ करती है। उसे हाथ से पकड़कर तेजी से घूमते हुए लोहे के चक्के पर रखकर घिसा जाता है। हीरे पर डिजाइन बनाने के लिए अलग-अलग तरह के कारीगर हुआ करते हैं, जो एक ही प्रकार की मशीनों पर बार-बार हाथों से हीरे को रखकर उसे तराशते हैं। घूमती मशीन पर हीरा घिसकर उसमें डिजाइन निकालते हैं। ऐसे ढेर सारे हमारे परिचित कारीगर आज भी हैं। हमें याद है उन दिनों हीरा तराशने के इतने ज्यादा कारखाने हो गए थे कि लोगों ने अपने मकान के ऊपर डबल मकान बना लिए। नीचे कारखाना और ऊपर रहना। यह चलने लगा। हीरे कारखाने वाले इतना कमाने लगे कि उन्हीं के दम पर इलाके के गणपति, नवरात्रि, गोविंदा व अन्य सार्वजनिक कार्यक्रमों की चांदी हो गई। चंदे के रूप में इन कारखानों से खासी रकम भी आने लगी। कारखानों में काम करने के अलावा तैयार हीरों की खरीदी-बिकवाली के लिए भी ढेर सारे लोग शेयर मार्वेâट की तरह हीरा मार्वेâट में जाते हैं। हीरे के व्यवसाय में खरीदी-बिकवाली के छोटे बाजार भी कई बने। इनमें एक बड़ा बाजार आज भी मालाड-पूर्व में दफ्तरी रोड से सटे रामलीला मैदान के पास है। यहां ७० के दशक में कई दुकानों में हीरे के लेनदेन के केंद्र बने, जो आज भी अच्छी तादाद में सक्रिय हैं। यहां कई कार्यालय हैंै, जहां हीरे की पुड़िया लिए लोग घूमते-फिरते दिखाई देते हैं। खुली सड़क पर अपनी जेब में छोटी-छोटी पुड़िया लिए लोग खड़े रहते हैं और एक-दूसरे को वह पुड़िया दिखाकर उसका भाव तय करके खरीदी-बिक्री करते हैं। पश्चिमी उपनगरों में मालाड का यह हीरा मार्वेâट आज भी दिनभर खचाखच भरा रहता है और यह हीरा मार्वेâट काफी लोकप्रिय है। उल्लेखनीय है कि हीरा खरीदी-बिक्री और हीरा तराशने के कारखाने के व्यापार में ज्यादातर गुजराती समुदाय के लोग ही हैं। इनमें भी पटेल, गांधी, शाह, मेहता जैसे नाम वाली कंपनियों के बोर्ड दिखाई देते हैं। हमें याद है कि ७०-८० के दशक में मालाड में प्रॉपर्टी के दाम हीरा उद्योग की भरमार की वजह से बढ़े थे। आज भी हीरा मार्वेâट के आस-पास की इमारतों के दाम भी हीरा मार्वेâट में काम करने वालों की वजह से बढ़े हुए हैं। इसी वजह से वहां कपड़े, पैâशन, खानपान, फल व अन्य सामग्रियों के ढेर सारे व्यवसाय भी अच्छी तरह फल-फूल रहे हैं। एक समय हीरा व्यापारियों के दम पर ही पश्चिमी उपपनगरों के ढेर सारे बीयर बार चला करते थे। बताते हैं कि इन बियरबारों में ढेर सारी रकम खर्च करने वाले अधिकांश हीरा व्यापारी ही होते थे।
मुंबई आज भी देश का सबसे ज्यादा जेम्स आभूषण निर्यात करने वाला हब है। लेकिन सूरत में डायमंड बोर्स बनाने से इस व्यापार के वहां शिफ्ट होने के संभावनाएं बहुत ज्यादा बढ़ गई हैं। हमारे कई परिचित जो मुंबई में हीरे व्यापार से जुड़े थे, उनमें से अधिकांश सूरत व आस-पास के शहरों में शिफ्ट होकर वहीं रच-बस गए हैं। इसलिए यह बात सही है कि मुंबई का हीरा व्यापार अब धीरे-धीरे गुजरात की ओर शिफ्ट हो चला है।
(लेखिका स्तंभकार एवं सामाजिक, राजनीतिक मामलों की जानकार हैं।)

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