इजहारे मुहब्बत

हमने रातों को पाला उजालों की तरह
दिन में बहस छिड़ गई सवालों की तरह।
कब?…क्यों?…कैसे?
कहने को वो हम पे जान छिड़कते थे
मगर दाग देते रहे वो, नये छालों की तरह।
दावा था उनका, हम तुम पे मरते हैं
नित बदलते रहे वो ख़यालों की तरह।
जरूरत क्या थी, दिल को तोलने-टटोलने की
हमने चाहा उनको जीभर, दिलवालों की तरह।
नाहक, अपनी वफा का सबूत क्यों मैं देता
हमारा दिल है नरम आज भी उनके गालों की तरह।
इजहारे मुहब्बत मैं कभी कर न सका
हरदम ख़ामोश रहा मैं बेदम दीवारों की तरह।
गुजर गई बहुत, थोड़ी बाकी है ‘त्रिलोचन’
हर लम्हा जीये जा तू मिसालों की तरह।

त्रिलोचन सिंह आरोरा,
नई मुंबई

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