मुख्यपृष्ठसमाचारडबल इंजिन सरकार का फेल्योर... विस्फोट से ढहा था उत्तराखंड का टनल!

डबल इंजिन सरकार का फेल्योर… विस्फोट से ढहा था उत्तराखंड का टनल!

‘ब्लास्ट एंड ड्रिल’ पद्धति से हो रहा है निर्माण

कच्चे पहाड़ में ‘टनल बोरिंग मशीन’ से बनानी चाहिए सुरंग

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

उत्तराखंड की टनल में फंसे मजदूर १७ दिनों बाद सुरक्षित वापस आ चुके हैं। मगर इस सवाल पर मीडिया ज्यादा ध्यान नहीं दे रहा है कि आखिर यह हादसा हुआ कैसे? आखिर यह किसकी गलती से हुआ? इस मामले में कुछ जानकारों और विशेषज्ञों से बातचीत के बाद जो तथ्य मिले हैं, वे भयावह तो हैं ही, साथ ही यह भी बताते हैं कि केंद्र और राज्य की डबल इंजिन सरकार ऐसी संवेदनशील परियोजनाओं के निर्माण के तहत सुरक्षा संबंधी मामलों में पूरी तरह फेल्योर है। बताया जा रहा है कि सुरंग निर्माण के दौरान विस्फोटकों के इस्तेमाल के कारण टनल के बीच में ६० मीटर का हिस्सा ढह गया था।
जानकारों के अनुसार, मानक यह कहता है कि सुरंग में कामकाज विशेषज्ञों और भूवैज्ञानिकों की निगरानी में होना चाहिए, मगर जमीन पर जाकर देखेंगे तो पता चलेगा कि मजदूर, ठेकेदारों की निगरानी में काम कर रहे हैं। ठेकेदार अपनी लागत पर ज्यादा ध्यान देते हैं, सुरक्षा और विज्ञान पर कम। जानकार बताते हैं कि सुरंग बनाने की दो तकनीक होती हैं। एक को कहते हैं ‘ब्लास्ट एंड ड्रिलिंग मशीन’ और दूसरी होती है, ‘टनल बोरिंग मशीन’। इन दोनों में टनल बोरिंग मशीन का कामकाज धीमा होता है। यह मशीन महंगी होती है। मगर ‘ब्लास्ट और ड्रिलिंग मशीन’ के मुकाबले कम घातक होती है। सिलक्यारा सुरंग में ब्लास्ट यानी विस्फोट और ड्रिलिंग मशीन के जरिए काम किया जा रहा था। इस तरीके में विस्फोट करके चट्टान को तोड़ा जाता है, जहां चट्टान तो टूट जाती है मगर संभावना यह भी पैदा होती है कि धमाके की वजह से दूर-दूर की चट्टानों में से कुछ कमजोर हो जाती हैं और बाद में यही चट्टानें घातक साबित होती हैं। उत्तराखंड यूनिवर्सिटी के भूवैज्ञानिक एसपी सती कहते हैं, ‘हालांकि सुरंग बनाने वाली कंपनियां कभी स्वीकार नहीं करतीं कि वे अपने काम में विस्फोटकों से ब्लास्ट करवाती हैं, हमने पहले भी बार-बार इसका उल्लंघन देखा है कि बहुत ज्यादा विस्फोटकों के जरिए ब्लास्ट कर चट्टानों को तोड़ा गया है। मेरा मजबूती से मानना है कि सुरंग के ढहने का अंतिम कारण एक बड़ा झटका था। इसकी जांच होनी चाहिए। भारी विस्फोटकों के इस्तेमाल से इनकार नहीं किया जा सकता है।’
एक्टिविस्ट इंद्रेश मैखुरी ने कहा है कि आल वेदर रोड, अब आल वेदर स्लाइडिंग रोड है। नियम यह है कि अगर १०० किलोमीटर से ज्यादा लंबी रोड बनाई जा रही है, तो उसके लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन यानी एनवायरमेंटल इंपैक्ट एसेसमेंट किया जाए। चारधाम प्रोजेक्ट ८८९ किमी लंबी परियोजना है। मगर पर्यावरण प्रभाव आकलन से बचने के लिए ८८९ किलोमीटर लंबी परियोजना को ५३ हिस्सों में बांट दिया गया। यानी इतनी बड़ी परियोजना का पर्यावरण प्रभाव आकलन नहीं हुआ। ऐसे में इस हादसे या चारधाम प्रोजेक्ट के तहत बनने वाली सड़कों पर भविष्य में जो हादसे होंगे, इसका दोषी कौन होगा?
नहीं था ‘एस्केप रूट टनल’
यूरोप के मुकाबले हिमालय का पहाड़ काफी नया है और कच्चा भी है। इस कारण वहां मिट्टी के धंसने की संभावना ज्यादा रहती है। इस कारण वहां निर्माण के दौरान विस्फोटकों का इस्तेमाल खतरनाक है। जानकारों के मुताबिक स्टैंडर्ड प्रक्रिया है कि इतनी बड़ी सुरंग बनाने के लिए एक ‘एस्केप रूट टनल’ (बचने का रास्ता) भी बनाया जाता है, ताकि आपदा के समय वहां से बाहर निकालने के लिए उस रास्ते का इस्तेमाल किया जाए। अगर ऐसा कोई मार्ग सिलक्यारा सुरंग में होता तो आसानी से मजदूरों को वहां से बाहर निकाल लिया जाता। सवाल है कि इस मानक को सिलक्यारा सुरंग बनाते समय क्यों नहीं अपनाया गया? इसके लिए सरकार, शासन-प्रशासन को क्यों उत्तरदायी नहीं मानना चाहिए?

अन्य समाचार