मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाअर्थार्थ : फैमिली फार्मर

अर्थार्थ : फैमिली फार्मर

पंकज जायसवाल। फैमिली डॉक्टर तो फैमिली फार्मर क्यों नहीं? आज हम इसी पर चर्चा करेंगे। आज डायरेक्ट मार्वेâटिंग का बोलबाला है। प्रबंध संस्थानों में व्यापार और उद्योगों के विपणन की तकनीकों के कई कोर्स हैं और लोग इसमें विशेषज्ञता हासिल करते हैं, लेकिन दुनिया में सबसे अधिक खपत होनेवाली तथा जिसके सबसे अधिक प्राकृतिक कारखाने हैं, कृषि भूमि के रूप में उसके विपणन की विशेषज्ञता हासिल करने की कतार सबसे कम है। जबकि तथ्य है कि दुनिया में सबसे अधिक उपभोक्ता, सबसे अधिक खपत, सबसे अधिक उत्पादन और सबसे अधिक प्राकृतिक कारखाने (कृषि भूमि) इसी के हैं। आज भी इसके विपणन में नवाचार और स्टार्टअप आइडिया का बहुत स्कोप है। एक बार चर्चा के दौरान मेरी भारत सरकार के पूर्व कृषि मंत्री राधामोहन सिंह और बुंदेलखंड में कृषि उद्यमिता का अलख जगा रहे श्याम बिहारी गुप्ता से किसानों के समृद्धि और सरंक्षण को लेकर लंबी बातचीत हुई, उसी दरम्यान पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने ही पैâमिली फार्मर कॉन्सेप्ट की वकालत की और कहा ‘पैâमिली डॉक्टर तो पैâमिली फार्मर क्यों नहीं?’ बकौल राधामोहन सिंह जिस तरह लोगों के पैâमिली डॉक्टर होते हैं, ठीक उसी तरह शहर और कस्बों के लोगों को पैâमिली फार्मर भी रखना चाहिए। किसानों को गोद लेना चाहिए। हर व्यक्ति खपत तो करता ही है यदि वह इसी तरह किसानों को गोद लेना शुरू कर दे तो किसानों के विपणन की बड़ी समस्या खत्म हो जाएगी। बातचीत के दौरान बुंदेलखंड के किसान श्याम बिहारी गुप्ता ने भी बताया कि किस तरह वह इस कॉन्सेप्ट पर आगे बढ़ रहें हैं, जिसमें उनका फोकस गाय आधारित कृषि को बढ़ावा देना है जो संयुक्त राष्ट्र के पैâमिली फार्म के कॉन्सेप्ट के नजदीक है।
हालांकि संयुक्त राष्ट्र के फैमिली फार्म और पैâमिली फार्मर के कॉन्सेप्ट में अंतर है। संयुक्त राष्ट्र के फैमिली फार्म कॉन्सेप्ट के अनुसार एक परिवार वैâसे खेती करके सुखद जीवन बिता सकता है? उसके बारे में बताया गया है। बकौल संयुक्त राष्ट्र ‘फैमिली फार्मिंग कृषि, वानिकी, मत्स्य पालन, पशुचारण और जलीय कृषि उत्पादन को व्यवस्थित करने का एक साधन है, जिसका प्रबंधन और संचालन एक परिवार द्वारा किया जाता है और मुख्य रूप से महिलाओं और पुरुषों दोनों के पारिवारिक श्रम पर निर्भर करता है, जबकि यहां हम फैमिली फार्मर की बात कर रहे हैं, जो इन किसानों के विपणन की समस्या के द्वारा उनकी समस्या को हल कर रहा है, जो संयुक्त राष्ट्र के मॉडल में डिस्कनेक्ट है। बकौल मध्य प्रदेश के सतना जिले के पद्मश्री विजेता किसान बाबूलाल दहिया के अनुसार ‘जैसे आपके पास पारिवारिक डॉक्टरों की अवधारणा हुआ करती है, वैसे ही सभी के लिए एक फैमिली फार्मर होना भी समय की आवश्यकता है।’ दहिया के अनुसार हम सभी शहरी निवासियों को कम से कम एक छोटे किसान को संरक्षण देना चाहिए, जिससे हम स्वच्छ भोजन की सामग्री खरीद सकें और बदले में उन्हें सशक्त समृद्ध और आत्मनिर्भर करें। छोटे किसानों को संरक्षण दें, हम अपने और अपने परिवार बच्चों के लिए स्वच्छ भोजन की गारंटी पा सकते हैं जो केमिकल मुक्त होगी।
कोरोना काल और लॉकडाउन के दौरान डायरेक्ट मार्केटिंग का प्रयोग देख लिया है, अब सिर्फ हमें इसका प्रयोग भर करना है। दुनिया के सबसे बड़े उत्पादकों का कल्याण तभी होगा जब जनता इनका सरंक्षक बन अपनी-अपनी जरूरतों के लिए उन्हें गोद ले और डायरेक्ट खेत से खरीदे। यदि इस तरह का बाजार बढ़ता है तो लॉजिस्टिक कंपनियां इसके बारे में सोचेंगी और वितरण का पूरा इकोसिस्टम खड़ा हो जाएगा। किसानों द्वारा किस प्रकार खेत को गोद देना-गोद लेना है, उसकी भी विधि विकसित की जा सकती है। यह एक ऐसा इकोसिस्टम होगा, जिसमें बाजार के बिना हस्तक्षेप के ग्राहक उत्पादक आपस में जुड़े होंगे।
यह इकोसिस्टम ऑर्गेनिक एवं स्वच्छ कृषि को प्रोत्साहित करेगी और लोगों के स्वास्थ्य को सही रखते हुए ग्रीन इकोनॉमी के लक्ष्यों के अधीन होगी। यह कॉन्सेप्ट ऐसा नहीं है कि एकदम से नया है। हिंदुस्थान के सनातन अर्थशास्त्र में विभिन्न रूपों में ग्रामीण इकोनॉमी के स्तर पर यह पहले से चला आ रहा था बस औपचारिक नहीं था। बहुत पहले एक अमेरिकी जर्नल ‘अमेरिकन एथिनोलॉजिस्ट’ में लेखक बैरी एच. मिशी ने इस बहुउद्देश्यीय संरक्षक-ग्राहक प्रणाली पर लेख के लिए हिंदुस्थान को ही चुना और १९८१ में उस जर्नल में प्रकाशित लेख का नाम था ‘कृषि संरक्षक-ग्राहक संबंधों का परिवर्तन: भारत से उदाहरण’ जिसमें उन्होंने बताया था कि बहुउद्देश्यीय संरक्षक-ग्राहक प्रणाली एक स्वायत्त स्थानीय सत्ता और निर्भर अर्थव्यवस्था के भीतर वैâसे असमान स्थिति, असमान धन और असमान शक्ति में विभक्त लोगों को जोड़ती है और वर्तमान में यह सरकारीकरण और वाणिज्यिक अर्थव्यवस्था से यह खत्म हो रही है। कैंब्रिज विश्वविद्यालय ने भी ‘सामाजिक आदान-प्रदान की संरचना के मॉडल के रूप में संरक्षक-ग्राहक संबंध’ शीर्षक के नाम से पेपर प्रकाशित किया है, जिसमें हिंदुस्थान के उल्लेख समेत कई शोध और लेख पत्रों का उल्लेख है।
मेरे हिसाब से आज के मौजूदा दौर में जब डायरेक्ट मार्केटिंग प्रयोग में सफल हो रही है और दुनिया भर के बाजारों में महंगाई कम करने के लिए मिडिल मैन को हटाने की बात हो रही है तो उनमें प्राथमिक कृषि उत्पाद के लिए यह फैमिली फार्मर कॉन्सेप्ट कारगर हो सकती है। सरकार को इसे जीरो बजट फार्मिंग के तौर पर एक मिशन के तौर पर पेश करना चाहिए जिसमें ‘देश के किसान देश की जिम्मेदारी’ भावना का भी प्रयोग किया जा सकता है। इसके लिए इकोसिस्टम विकसित करने के प्रयासों में किसानों को विपणन की नव तकनीकों से जोड़ना और यह सिर्फ किसानों से नहीं हो सकता है इसमें तकनीकी दक्ष युवाओं को भी जोड़ना पड़ेगा। इसके तहत व्हॉट्सऐप ग्रुप से लगायत ऐप एवं लॉजिस्टिक इकोसिस्टम से जुडी स्टार्ट अप कंपनियों को इस कॉन्सेप्ट से जुड़ने का आह्वान करना चाहिए जो कि तकनीक का इस्तेमाल कर किसान और ग्राहक सरंक्षकों को नजदीक लाएंगी, उनके इन्वेंटरी के प्रबंधन साथ लॉजिस्टिक को भी कनेक्ट करेंगी और इस प्रकार पैâमिली फार्मर नाम से सरंक्षक की इस अवधारणा को साकार करेंगी। पैâमिली फार्मर का यह कॉन्सेप्ट हिंदुस्थान जैसे देश में जहां सीमांत किसानों की संख्या ज्यादा है कारगर होगी, क्योंकि उन्हें पैदा करना तो आता है। बेचने के मामले में नई और पूंजीवादी तकनीकी व्यवस्था में वह मात खा जाते हैं, ऐसे में संयुक्त राष्ट्र के फैमिली फार्म, सरंक्षक अवधारणा के पैâमिली फार्मर और गाय के सरंक्षण को यदि एक साथ जोड़ दिया जाय तो किसानों के समृद्धि का महामार्ग तैयार कर सकते हैं।
(लेखक अर्थशास्त्र के वरिष्ठ लेखक एवं आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक विषयों के विश्लेषक हैं।)

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