" /> ‘हरियाली एवं खुशहाली का पर्व’…‘वसंत पंचमी’ है मां वीणावादिनी का दिन

‘हरियाली एवं खुशहाली का पर्व’…‘वसंत पंचमी’ है मां वीणावादिनी का दिन

भारत एक कृषि प्रधान देश है, साथ ही यहां विविध त्यौहार, दिन एवं परंपराओं का भी प्रचलन है। इस देश में हर मौसम ऋतु एवं दिन के अलग-अलग महत्व हैं। यहां ऋतुओं में वसंत ऋतु का विशेष महत्व है। यह ऋतु लोगों के मन में उल्लास, खुशियां एवं भविष्य के जीवन की अपार संभावनाएं लेकर आती है। इस ऋतु में भी एक खास ‘वसंत पंचमी’ का दिन होता है। ये दिन भारतीय संस्कृति, परंपराओं एवं शिक्षा से संबंधी लोगों के लिए महत्वपूर्ण होता है। वसंत पंचमी को वीणावादिनी अर्थात मां सरस्वती का दिन भी कहा जाता है। इसके अलावा किसानों के लिए भी ये महीना खासकर ये दिन विशेष मायने रखता है। किसान इसी दिन अपने लहलहाते खेतों से जौ और गेहूं की बालियों (पहले अन्न) को तोड़कर लाते हैं एवं अपने इष्टदेव को चढ़ाने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। इस वसंत पंचमी को लेकर अनेक पौराणिक कथाओं के साथ ऐतिहासिक कथाएं भी प्रचलित हैं। इस वर्ष यह वसंत पंचमी का त्यौहार आज अर्थात १६ फरवरी को मनाया जा रहा है।
मां सरस्वती का प्रकट दिन
उपनिषदों की कथा के अनुसार सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान शिव की आज्ञा से भगवान ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की लेकिन अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि इसमें कुछ कमी रह गई है। ब्रह्मा जी ने इस समस्या के निवारण के लिए भगवान श्री विष्णु की स्तुति की। इसके बाद भगवान विष्णु ने आदिशक्ति दुर्गा माता का आवाहन कर इस संकट को दूर करने का निवेदन किया तो दुर्गा माता ने अपने शरीर से स्वेत रंग का एक तेज उत्पन्न किया, जो एक दिव्य नारी के रूप में बदल गया। यह स्वरूप एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था, जिनके एक हाथ में वीणा तथा दूसरे हाथ में वर मुद्रा थे। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। आदिशक्ति श्री दुर्गा के शरीर से उत्पन्न तेज से प्रकट होते ही उस देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, जिससे संसार के समस्त जीव-जंतुओं को वाणी प्राप्त हो गई। तब सभी देवताओं ने शब्द और रस का संचार कर देनेवाली उन देवी को वाणी की अधिष्ठात्री देवी ‘सरस्वती’ कहा। सरस्वती को वागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादिनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। वसंत पंचमी के दिन को इनके प्रकट उत्सव के रूप में भी मनाते हैं। पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी। तभी से इस वरदान के फलस्वरूप भारत देश में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो आज तक जारी है।
पौराणिक महत्व
यह त्यौहार हमें त्रेता युग से भी जोड़ता है। सर्वविदित है कि भगवान श्रीराम, माता सीता की खोज में भटकते हुए दंडकारण्य वन में पहुंचे तो वहीं उनकी मुलाकात माता शबरी से हुई थी, जिन्होंने जूठी बेर खिलाया था। पुराणों के अनुसार जिस दिन प्रभु श्रीराम माता शबरी के आश्रम में पधारे थे उस दिन भी वसंत पंचमी का ही दिन था। वर्तमान में दंडकारण्य वन का वह क्षेत्र गुजरात और मध्यप्रदेश में पैâला हुआ है। खासकर माता शबरी का आश्रम गुजरात के डांग जिले में आता है। यहां के वनवासी आज भी जहां श्रीराम आकर बैठे थे, उस शिला की पूजा करते हैं।

ऐतिहासिक महत्व
क्षमा, दया और उदारता की प्रवृत्ति रखनेवालों को राजा पृथ्वीराज चौहान की कहानी विशेष सीख देती है। पृथ्वीराज चौहान जिन्होंने मोहम्मद गोरी को १६ बार पराजित किया लेकिन हर बार उदारता के साथ उसे जीवित छोड़ दिया। जब १७ वीं बार वे पराजित हुए तो मोहम्मद गोरी ने उनकी आंखें फोड़ दी। गोरी ने मृत्यु दंड देने से पहले उनकी शब्दभेदी बाण चलाने की कला को परखने की इच्छा प्रकट की। इसके बाद पृथ्वीराज के साथी कवि चंदबरदाई के सुझाव पर मोहम्मद गोरी ने ऊंचाई पर बैठकर तवे पर चोट करते हुए संकेत किया, तभी चंदबरदाई ने चौहान को संकेत दिया….
‘चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान।
ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान।।’
चंदबरदाई के संकेत मिलने के बाद पृथ्वीराज ने भूल नहीं की। उन्होंने तवे से निकलने वाली ध्वनि एवं संकेत के अनुसार अनुमान लगाकर बाण छोड़ दिया, जो मोहम्मद गोरी के सीने में धंसा और इसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने भी एक-दूसरे को छूरा घोंपकर आत्मबलिदान दे दिया। यह घटना (११९२ ई.) ‘वसंत पंचमी’ के दिन ही हुई थी।