आग

तुझ में भी आग है
मुझ में भी आग है
मगर मेरी आग में
वो ताप नहीं।
यूं हम-तुम में कोई दूरी नहीं
फिर कौन सी है वो रेखा
आ पाते हम पास नहीं
खोये-खोये से प्राण मेरे
नम हैं आंखें
हृदय दहा करता है।
ध्यान से सुनो प्रिये
प्रथम नहीं ये निवेदन मेरा
ये सावन हर बरस मेरी
पीर कहा करता है।

डाॅ. रवींद्र कुमार

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