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पांच साल के बच्चे ने छह महीनों में कैंसर को दी मात …दुर्लभ बर्किट लिंफोमा कैंसर का हुआ था शिकार

इम्यून सेल से होती है शुरुआत
कीमोथेरेपी ही इसका इलाज

सामना संवाददाता / मुंबई
एक परिवार पर उस समय पहाड़ टूट पड़ा, जब उन्हें पता चला कि उनका पांच साल का बच्चा वैंâसर के दुर्लभ प्रकार बर्किट लिंफोमा का शिकार हो चुका है। हालांकि, छह महीनों तक चले इलाज के बाद बच्चे ने वैंâसर को पूरी तरह से मात दे दी है और वह अब इस जानलेवा बीमारी से मुक्त हो चुका है और सामान्य जीवन जी रहा है। चिकित्सकों के मुताबिक, यह दुर्लभ वैंâसर नॉन हॉजकिन्स लिंफोमा का एक रूप है, जो बी-लिंफोसाइट्स नामक इम्यून सेल से शुरू होता है। इतना ही नहीं इसकी केवल कीमोथेरेपी ही एकमात्र इलाज पद्धति है।
मिली जानकारी के अनुसार, वर्ष २०२२ में पांच वर्षीय बच्चे को गर्दन के दाहिने हिस्से में सूजन की शिकायत को लेकर उसका परिवार एक स्थानीय डॉक्टर के पास गया था। शुरुआत में सूजन मटर के आकार की थी। हालांकि, दो महीनों के भीतर यह बड़ी तेजी से बढ़ गया और सूजन गर्दन की बार्इं ओर तक पहुंच गया। ऐसे में उसे रात में खर्राटे भी आने लगे थे। इन लक्षणों को देखते हुए एक बायोप्सी की गई, जिससे पता चला कि बच्चे को बर्किट लिंफोमा है, जो लिम्फ नोड्स का एक प्रकार का ब्लड वैंâसर है। इसके बाद बच्चे का परिवार उसे पिछले साल दिसंबर में मुलुंड के फोर्टिस अस्पताल ले गया, जहां एक अतिरिक्त सीटी स्वैâन किया गया, जिससे पता चला कि ट्यूमर बच्चे के टॉन्सिल, गर्दन और बगल में मौजूद था। बाद के परीक्षणों से यह भी पता चला कि रोगी वैंâसर के प्रारंभिक चरण में था और ऐसे मामलों में कीमोथेरेपी की उच्च सफलता दर है।
प्रभावी उपचार प्रक्रिया
कीमोथेरेपी बर्किट लिंफोमा के खिलाफ कीमोथेरेपी बहुत ही प्रभावी उपचार प्रक्रिया है, जो करीब ९०-१०० फीसदी तक उच्च इलाज दर प्रदान करता है। हालांकि, इस तरह की स्थिति वाले बच्चों की मदद के लिए बीमारी का जल्द पता चलना और शीघ्र उपचार महत्वपूर्ण था। इसके अलावा इस मरीज के जुड़वां भाई-बहन एक जैसे नहीं हैं इसलिए अनुवांशिक परामर्श और सक्रिय निगरानी आवश्यक है, क्योंकि दूसरे जुड़वां भाई-बहन में वैंâसर होने का खतरा लगभग ३५ फीसदी है।

बिना किसी जटिलताओं के दी गई कीमोथेरेपी
अस्पताल की बाल चिकित्सा ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. जूही शाह ने कहा मरीज बहुत छोटा था इसलिए आसानी से कीमोथेरेपी देने और त्वचा की चुभन को कम करने में मदद करने के लिए उसके शरीर में एक कीमो पोर्ट डालना पड़ा। उसे इंट्राथेकल कीमोथेरेपी भी दिया गया, जो ब्रेन के वैंâसर से बचाता है। अगले छह महीनों में बच्चे को बिना किसी जटिलता के कीमोथेरेपी के छह दौर से गुजरना पड़ा। इलाज के केवल दो सत्रों के बाद किए गए सीटी स्वैâन में बच्चे में बीमारी के कोई लक्षण नहीं दिखे। हालांकि, बीमारी दोबारा न हो इसलिए उसे अतिरिक्त चार सत्रों से गुजरना पड़ा।

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