अफवाहों की आंच

अफवाह के बादल छाते हैं
सोच-समझ मिट जाती है
भेड़िए मैदानों में आकर
खूंखार आवाज लगते हैं।
सुन भेड़ियों की आवाज
जनता की जान पर आ जाती है
कुछ की हड्डी टूटती है
कुछ की सांसें रुकती हैं।
पर अक्सर अफवाहों की
चाल में निर्दोषी मारे जाते हैं।
गर रुकी नहीं अफवाहें तो
भेड़िए और आवाज लगाएंगे
रैयत बाप-बाप चिल्लाएगी
आतंकी खुल्लम गाना गाएंगे
मानवता शर्मसार हो जाएगी
दुनिया अब सिखलाएगी।
क्या नहीं समझते अब तुम
कब शीशा फोड़ा जाता है
कब खिड़की तोड़ी जाती है
कब अभिनेता मिलने आते हैं?
समझ सको तो समझो इनके
आजादी से इतिहास को
मैं तो करता आग्रह तुमसे
मत सफल बनाओ चाल को।
गर नहीं रूकेंगी चालें इनकी
तो चोर-चमारी, बढ़ जाएगी
न्यायी न्याय-न्याय चिल्लाएगा
आनेवाले कुछ ही सालों में
भारत अंधेर नगरी बन जाएगा।
-रत्नेश कुमार पांडेय

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