मुख्यपृष्ठनए समाचारसमुद्री तूफानों की बाढ़!

समुद्री तूफानों की बाढ़!

डॉ. रमेश ठाकुर

समुद्री तूफानों के आने की झड़ी लगी हुई है। सवाल उठता है कि आखिर कुछ मध्य अंतराल बाद क्यों समुद्री तूफान आते हैं और भयंकर तबाही मचाते हैं? ये बड़ा सवाल ‘मिचौंग तूफान’ ने और बड़ा कर दिया है। हालांकि, सवाल प्रासंगिक भी है। क्योंकि बीते दशकों में पहले तूफान कभी साल या दो साल में ही दस्तक देते थे। लेकिन इस २०२३ में मिचौंग चक्रवात छठा समुद्री तूफान है। इसके पहले मई में ‘मोचा तूफान’ आया था, उसके अगले ही माह यानी जून में ‘बिपरजॉय चक्रवात’ आया, वहीं अक्टूबर में दो तूफान पंद्रह दिन के भीतर ‘तेज और हामून’ आए। पिछले महीने नवंबर में ‘मिधिली तूफान’ ने दस्तक दी और अब ‘मिचौंग’ फनफना रहा है। पूर्व के सभी तूफानों ने तबाही मचाई, जिसमें सबसे ज्यादा तबाही की बिपरजॉय ने। हालांकि, कोई तूफान ऐसा नहीं, जिसने जनमानस के जीवन को अस्त-व्यस्त न किया हो। ये तूफान ऐसा जख्म छोड़कर जाते हैं, जिन्हें भरने में काफी वक्त लगता है। लेकिन उसका दर्द कभी खत्म नहीं होता।
तूफानों की सच्चाई को लेकर केंद्र व राज्यों की हुकूमतें बेशक इस बात को नकारे कि ये सब मानवीय हिमाकतों के चलते नहीं होता? पर ये सच है कि इंसान पर्यावरण का जिस तरह से दोहन कर रहा है, उसका खामियाजा तो किसी न किसी रूप में भुगतना ही होगा। तूफानों की दस्तक उसी का प्रतिफल मानव को परोसते हैं। पहाड़ों की छाती चीरकर इंसान रास्ते बनाने में तुला है। समुद्रों की कोख को पाटकर पुलों का निर्माण कर रहा हैं। इसके अलावा वो सब कुछ कर रहा है, जो प्रकृति के खिलाफ है। मानव की ये कारस्तानियां रुक नहीं रहीं, बल्कि और तेज होती चली जा रही हैं। समुद्रों में एकाध महीनों के बाद उमड़ते ‘मिचौंग’ जैसे जानलेवा तूफान इसी बात के उदाहरण हैं। प्रकृति के बनाए उसूलों-परंपराओं में इंसान लगातार दखलंदाजी कर रहा है। अगर ऐसा न हो तो शायद इतनी जल्दी-जल्दी समुद्र में प्रलयकारी तूफान न आएं। कुछ दशक पूर्व तक समुद्र में तूफान आते थे तो शोर मचाकर चले जाते थे, उग्र नहीं होते थे। लेकिन अब अपना रौद्र रूप दिखाए बिना जाते नहीं? समुद्र में साल में छह-छह बार आते विनाशकारी तूफान और लगातार बढ़ती किस्म-किस्म की कुदरती आपदाओं को देखकर लगता है कि २१वीं सदी मानवीय संकट से भरी हुई है। मानव जीवन को कुदरती आपदाओं ने चारों ओर से घेर लिया है। कहीं पहाड़ दरक रहे हैं तो कहीं सुरंगें धराशाही हो रही हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे मानो मानव जीवन पर परेशानियों के पहाड़ ही टूट पड़े हैं, तभी तो एक संकट खत्म नहीं होता, दूसरी परेशानी दस्तक दे देती है।

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