मुख्यपृष्ठस्तंभउड़न छू : देश बनाम इंडिया

उड़न छू : देश बनाम इंडिया

अजय भट्टाचार्य
राजा ओह सॉरी, ओह माफ करें दिमागी पैदल समर्थकों के मान्य न भूतो न भविष्यति अवतार पुरुष के आका यानी मालिक यानी स्वामी का आदेशात्मक सुझाव आया कि देश का नाम भारत ही होना चाहिए। मतलब अब तक भारत नहीं था? लेकिन मूर्खता का इम्तिहान यानी परीक्षा के लिए इस तरह के शिगूफे बहुत जरूरी होते हैं। ये टोटके ही तय करते हैं कि देश और देश की जनता को किस हद तक मूर्ख बनाया जा सकता है। कोरोना में ताली-थाली नाद से लेकर मैं भी चौकीदार तक यही प्रयोग होते रहे हैं और अब भी जारी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे देश का नाम सभी जगह अपना होना चाहिए जिससे हमें भारतीयता के गौरव का अहसास होता रहे न कि अगस्थनीज के दिए हुए नाम इंडिया से गुलामी का। प्रश्न यह है कि देश का नाम बदलने का काम भारत सरकार को जो खुद को पहले की सरकारों से ज्यादा राष्ट्रवादी हिंदूवादी मानती है, को २०१४ में ही यह काम करने से किसने रोका था? बल्कि इससे पहले बाजपेयीजी के काल में ही हो जाना चाहिए था। सरकार बहादुर को भी ९ साल के बाद क्यों याद आई? २०१४ में क्यों नहीं?
दिमागी पैदलों की दिक्कत यह है कि इंडिया के बरक्स भारत को खड़ा कर वे भारत को ही खारिज करना चाहते हैं। यह बहुत बड़ी कलाकारी है जो हिंदू को हिंदू से अगड़ा-पिछड़ा पिछड़ा कर लड़वाती है, अब भारत को इंडिया से लड़वाने का भी प्रारूप सामने है।
इसलिए उनके झुंड में गुप्त मुनादी हुई कि राजा चाहता है कि देश का नाम भारत ही बोला, कहा, सुना, लिखा, पढ़ा जाना चाहिए। दिमाग से पैदल राजाजी के चाहनेवाले बोले, ‘अहो भाग्य! देश भारत ही है। इंडिया नाम हमें नहीं स्वीकार। अब हमारा जीना, मरना, खाना, पीना, ओढ़ना, बिछाना, सोना, जागना सब कुछ भारत में ही होगा। तभी हम जगत गुरु बन पाएंगे!’
‘अरे वो तो ठीक है मगर सिर्फ इंडिया को ही भारत करना/कहना है या?’ भारत भक्त बोले।
‘या मतलब क्या?’
‘मतलब जहां-जहां इंडिया घुसा हुआ है उसका क्या करना है?’
‘आप तो इंडिया को भारत समझो/करो/प्रचार करो प्रसार करो।’
‘महाराज इंडिया गेट और गेट वे ऑफ इंडिया का क्या करना है?’
‘अरे मूरख! भारत द्वार, भारत आने का द्वार भी कह सकता है।’
‘फिर द्वारका किस द्वार का है?’
‘ओफ्फ हो… अब द्वारका क्यों घुसेड़ रहा है इसमें?
‘वो तो ऐसे ही पूछ लिया था। वैसे सरकार बहादुर ये बताइए कि इंडिया को भारत कहने का कीड़ा अभी ही क्यों काटा? आप ही तो कहते थे जीतेगा इंडिया, मेक इन इंडिया वगैरह वगैरह।’
‘वो तो कहने के लिए था?’
‘फिर यह भी तो कहने के लिए ही है न?’
‘नहीं, तुम इस बात को समझो। वे जो मेरे विरोधी हैं उनका नाम इंडिया है।’
‘लेकिन उनका नाम तो इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इनक्लूसिव एलायंस है?’
‘वही तो सारे फसाद की जड़ है। उसी का लघु नाम इंडिया है। पहले मैं वोट फॉर इंडिया कहता था। अब कहूंगा तो लोग इंडिया को वोट देकर जिता दिए तो!’
‘तो हमें क्या करना चाहिए मेरे भगवन?’
‘तुम इतना करो कि इंडिया वाले जो कहें/करें उसका विरोध करना है, बस।’
‘वो तो कहते हैं कि जुड़ेगा भारत जीतेगा इंडिया। तो क्या भारत को जुड़ने से रोकना है और इंडिया मतलब भारत को जीतने से रोकना है? स्पष्ट करें भगवन!’
‘तुमको भारत को जिताना है और इंडिया को हराना है।’
‘महाराज भारत जीतेगा तो इंडिया भी जीतेगा न! फिर इंडिया वैâसे हारेगा?’
‘अरे उनका इंडिया है और अपना भारत है।’
‘महाराज और भी कई कन्फ्यूजन हैं।’
‘क्या?’
‘आप कहते हो इंडिया नाम विदेशियों ने दिया। फिर नई संसद का नाम सेंट्रल विस्टा क्या वेदों, उपनिषदों, पुराणों से लिया गया है? कितना पवित्र और सुंदर लगता है यह सेंट्रल विस्टा कहना! लेकिन मैंने कहीं पढ़ा कि विस्टा शब्द तो इटली से लिया गया है!’
‘वेरी गुड, ओह! बहुत अच्छा अब मैं सेंट्रल विस्टा का भी नया नाम रख दूंगा। तुम तो भारत पर अड़े रहो।’
‘जो हुकुम! मगर फिर भी एक समस्या है प्रभु!’
‘क्या’
‘आप कहते हो जो इंडिया वाले कहते/करते हैं उसका विरोध करना है। मेरी समस्या यह है सभी इंडिया वाले मुंह से खाते हैं, नाक से सूंघते-सांस लेते हैं, आंखों से देखते, कानों से सुनते, हाथों से काम करते और पैरों से चलते हैं। इन सब क्रियाओं का विरोध वैâसे किया जाना है? बाकी के अंगों द्वारा की जानेवाली क्रिया के विरोध में वैकल्पिक व्यवस्था क्या है? दूसरी यह कि अंग्रेजों ने ही दिल्ली को राजधानी बनाया था क्या गुलामी के इस प्रतीक को भी बदला जाएगा?’
भक्त की आखिरी जिज्ञासा का उत्तर खोजने के लिए सरकार बहादुर एंटायर पॉलिटिकल साइंस की किताबें खंगालने में जुटे हैं। अदालत वाले पंडितजी अपने चैनल का नया नाम खोज रहे हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)

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