मुख्यपृष्ठस्तंभउड़न छू : ‘कमल’ की ‘नाथ’

उड़न छू : ‘कमल’ की ‘नाथ’

अजय भट्टाचार्य

नेताजी को पूरी उम्मीद थी दिल्ली पहुंचते ही दिल्लीशाही उनके स्वागत में उठ खड़ी होगी। राज्य से लेकर देशभर में गोदी मीडिया हाहाकारी खबर परोस रहा था। पिता-पूत दोनों दत्तक होने को तैयार थे। मीडिया कह रहा था कि बस आजकल कभी भी ‘कमल’ के ‘नाथ’ हो जाएंगे, लेकिन यह राजनीति भी नाथ की तरह है, नाथ अर्थात बैल, घोड़े आदि जानवरों की नाक में फंसाई जानेवाली रस्सी। जब कोई जानवर बेकाबू होने लगे, तब उसे काबू में करने के लिए नाथा जाता है। कम से कम मध्य प्रदेश के पुराने भाजपाइयों का स्वाभिमान जागा और बेलगाम होती दिल्लीशाही पर लगाम कस दी। खबर है कि कमलनाथ तीन दिन तक दिल्ली में डेरा डाले बैठे रहे, लेकिन शाह और शहंशाह ने घास नहीं डाली! न ही प्रदेश के दामादजी ने बुलाया। जी हां, आजकल आलाकमान की कुर्सी पर दामादजी ही हैं यह अलग बात है कि कि उनकी भी लगाम किन्हीं और के हाथों में है। सत्ता के बिचौलिए बात चला रहे थे, लेकिन मोहरे नहीं हिला पा रहे थे। ऐसा लगा कि कमलनाथ अनाथ हो गए हैं। न खुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम वाली स्थिति थी।
टेलीविजन वाला गोदी मीडिया अब शामिल ही समझो वाले मोड़ में था। सपूतजी ने सोशल मीडिया पर बायोडाटा भी बदल लिया था। मगर नेताजी न खुद समझ पा रहे थे और न ही इकरार या इनकार कर पा रहे थे। एलान तो दूर की बात थी। दहलीज पर खड़े दरवाजा खुलने के इंतजार में टकटकी लगाए अड़े रहे खड़े रहे। उधर बंद कमरों में शाह और सूबे के दामादजी अलग जोड़-तोड़ में लगे थे। सत्ता का भंडारा बनती जा रही पार्टी को डर लगा कि अगर एक को खाने पर बुलाया तो पूरा कुनबा ही आ धमकेगा। पहले आनेवाले महाराज संभाले नहीं जा रहे हैं नए दूल्हे और बारातियों के लिए पंडाल और दरी बिछाने और खिलाने के लिए दोना-पत्तल कहां से लाएंगे। महाराज आए थे तो सरकार गिराने की मजबूरी थी, लेकिन फिलहाल न कमलनाथ की जरूरत है, न ही उनसे कोई खास मोहब्बत। सिर्फ छिंदवाड़ा की एक लोकसभा सीट को जीतने करने के लिए कमलनाथ की जोखिम उठाना और उनसे जुड़ी कांग्रेस की पाप की गठरी को कंधे पर लादना न भाजपा के चाणक्य को भाया और न अध्यक्षजी के गले उतर पाया।
जिस ‘विष’ को कांग्रेस बड़ी मुश्किल से विसर्जित कर रही है, उसे गारंटी बांटने वाले विश्वगुरु भी स्वेच्छा से ग्रहण करने के लिए उत्साहित नहीं थे। विश्वगुरु आखिर कितना विष ग्रहण करें? राजनीति में विपक्ष का विष पचानेवाले विश्वगुरु आधुनिक भारतीय राजनीति के नीलकंठ हैं। देश के भ्रष्टतम नेताओं को गले लगाकर उन्होंने जो विषपान किया है, उस समर्पण भाव को देश और समाज कभी भूल नहीं सकता। पेमा खांडू, जय पांडा, नारायण राणे, हिमंता विश्वा सरमा, सुवेंदु अधिकारी, बीएस बोम्मई, छगन भुजबल, रघुबर दास, हसन मुश्रीफ, अजीत पवार, एकनाथ शिंदे, अशोक चव्हाण जैसे विषकलश अंजुरी में भरकर पीने वाले राजनीति के नीलकंठ कमल नाल से और विष पीते कि मध्य प्रदेश के भाजपाई समंदर में मंथन हुआ और एक संदेश दिल्लीशाही तक भेजा गया कि भाजपा सिर्फ दो लोगों की पार्टी नहीं है। कमलनाथ आना भी चाहेंगे तो यहां के भाजपाई उन्हें अपना नहीं पाएंगे और उन्हें अपना भी लेंगे तो उनके साथ चिपके कांग्रेसियों के बोझ को कैसे ढोएंगे। नेताओं ने समझाया कि पार्टी को यह जोखिम उठाने पर क्या मिलेगा? राज्य में अगले पांच साल तक तो कांग्रेस नाम का खतरा सत्ता का कुछ नहीं बिगाड़ सकता, इस जोड़-तोड़ से यदि भाजपा एक राज्यसभा सीट और हासिल करने का गणित भी लगाए और यह विचार दिमाग में भी लाए कि कमलनाथ के आने से कई विधायक टूट जाएंगे और कांग्रेस की इकलौती राज्यसभा सीट भी हड़प जाएंगे तो यह सौदा भी महंगा पड़ेगा, क्योंकि जो विधायक कांग्रेस से भाजपा में आएंगे, वे या तो अयोग्य होकर दोबारा चुनाव लड़के के लिए भाजपा से टिकट की उम्मीद लगाएंगे और ऐसे में जिस तरह महाराज के समर्थकों ने भाजपाइयों का हक छीना, उसी तरह नाथ समर्थक भी बरसों की भाजपा की निष्ठा से जुड़े कार्यकर्ताओं के हकों पर डाका डालेंगे। अब तक सबको ज्ञान बांटने वाले विश्वगुरु की अंतरप्रज्ञा जागृत हुई और उन्होने नया विष पीने से मना कर दिया। पिछले महीने ही उन्होंने राम मंदिर का उद्घाटन किया है इसलिए जैसे शबरी के जूठे बेर खाकर राम ने खाकर समाज में एक बड़ा संदेश दिया वैसे ही राजनीति के जूठे और विषैले बेर खाकर गारंटी वाले बाबाजी युवा पीढ़ी पर नैतिकता की अमिट छाप छोड़ रहे हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)

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