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उड़न छू- देशभक्त मुर्गी

अजय भट्टाचार्य

मुर्गी अंडे दे रही थी और मालिक बेच रहा था। मुर्गी देशहित में अंडे दे रही थी। उसके मालिक ने कहा था- ‘आज राष्ट्र को तुम्हारे अंडों की जरूरत है। यदि तुम चाहती हो कि तुम्हारा घर सोने का बन जाए तो ज्यादा से ज्यादा अंडे दिया करो। आज तक तुमसे अंडे तो लिए गए, लेकिन तुम्हारा घर किसी ने सोने का नहीं बनवाया। यह कार्य हम करेंगे। तुम्हारा विकास करके छोड़ेंगे।’
मुर्गी खुशी से नाचने लगी। उसने सोचा देश को मेरी भी जरूरत पड़ती है। वाह मैं एक क्या कल से दो अंडे दूंगी। देश है तो मैं हूं। वह दो अंडे देने लगी। मालिक खुश था। अंडे बेचकर खूब पैसे कमा रहा था।
निहायत लालची मालिक ने मुर्गी की खुराक कम कर दी।
मुर्गी चौंकी और पूछा, ‘आज मुझे पर्याप्त खुराक नहीं दी गई। कोई समस्या है क्या?’
मालिक ने कहा- ‘देश आज संकट में है। देशहित में आज त्याग की जरूरत है। अब देशहित में आधे अन्न से ही गुजारा करना पड़ेगा।’
देश भक्ति में चूर मुर्गी ने कहा, ‘आप चिंता न करें मालिक! मैं देशहित में हर संकट सहने को तैयार हूं।’
मुर्गी आधा पेट खाकर अंडे देने लगी। मालिक अंडे बेचकर अपना घर भर रहा था। बरसात में मुर्गी का घर नहीं बन पाया।
मुर्गी बोली, ‘आप मेरे सारे अंडे ले रहे हैं। मुझे आधा पेट खाने को दे रहे हैं। कहा था कि घर सोने का बनेगा। नहीं बना। कम-से-कम मेरे घर की मरम्मत तो करवा दो।’ मालिक भावुक हो गया और बोला, ‘तुमने कभी सोचा है इस देश में कितनी मुर्गियां हैं जिनके सिर पर छत नहीं हैं। रात-रातभर रोती रहती हैं। तुम्हें अपनी पड़ी है। तुम्हें देश के बारे में सोचना चाहिए। अपने लिए सोचना तो स्वार्थ है।’
मुर्गी चुप हो गई। देशहित में मौन रहने में ही उसने भलाई समझी। अब वह अंडे नहीं दे पा रही थी। कमजोर हो गई थी। न खाने का ठिकाना न रहने का। वह बोलना चाहती थी लेकिन भयभीत थी। वह पूछना चाहती थी- ‘इतने पैसे जो जमा कर रहे हो वह क्यों और किसके लिए? देशहित में कितना लगाया है?’ लेकिन पूछ नहीं पाई। एक दिन मालिक आया और बोला, ‘मेरी प्यारी मुर्गी तुझे देशहित में मरना पड़ेगा। देश तुमसे बलिदान मांग रहा है। तुम्हारी मौत हजारों मुर्गियों को जीवन देगा।’ मुर्गी बोली, ‘लेकिन मालिक मैंने तो देश के लिए बहुत कुछ दिया है,’ मालिक ने कहा, ‘अब तुम्हें शहीद होना पड़ेगा।’ बेचारी मुर्गी को अब सब कुछ समझ आ गया था। लेकिन अब वक्त जा चुका था और मुर्गी कमजोर हो चुकी थी, मालिक ने मुर्गी को बेच दिया। मुर्गी किसी बड़े भूखे सेठ के पेट का भोजन बन चुकी थी। आखिर, मुर्गी देशहित में शहीद हो गई!
कुछ इसी तरह की देशभक्ति का पाठ देश की जनता को गैस सब्सिडी छोड़ने और रेलवे के यात्री भाड़े में दी जानेवाली सहूलियतों में कटौती कर समझाया गया। सोशल मीडिया पर देशभक्ति से सराबोर पोस्ट तैर रही हैं कि रोटी, कपड़ा, मकान के लिए तो सभी वोट करते हैं, इस बार राष्ट्र की मजबूती के लिए वोट करना है। फलाने वाले ५६ इंची सीने वाले हैं वही देश बचा सकते हैं। आप तो अंबानियों, अदानियों की समृद्धि में देश की समृद्धि देखो और देश की समृद्धि में अपनी संतुष्टि का अनुभव कर गुब्बारे जैसे फूले रहे। यह समृद्धि ही है जो देश के ८० करोड़ नागरिक सरकारी राशन पर जिंदा है, जिसे इस तरह प्रचारित किया जाता है कि वडनगर के चायवाले ने अपनी कमाई से पैसा इकट्ठा कर गरीबों को मुफ्त राशन की व्यवस्था की। आप तो देशभक्ति में अपने बच्चों को श्रीराम के नारे के साथ दंगे करने भेजिए, क्योंकि इससे धर्म की रक्षा होगी मगर उनके बच्चे विदेशों में पढ़कर देश सेवा करेंगे।
जो आप सोच रहे हैं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। ये सिर्फ एक मुर्गी की कहानी है। आप देशहित में त्याग करते रहिए महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी इन पर ध्यान मत दीजिए। मालिक पर भरोसा रखिए। आखिर एक दिन सभी को दुनिया से जाना है। सभी को देशहित में बिना चूं-चपड़ किए अंधभक्त बने रहना चाहिए। बोलना या सवाल करना आपको गद्दार बना सकता है!

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