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उड़न छू : कैसा राजा

अजय भट्टाचार्य

राजा के दरबार में एक आदमी नौकरी मांगने के लिए आया तो उस व्यक्ति से उसकी काबिलियत पूछी गई। वह बोला-मैं आदमी हो चाहे जानवर, उसकी शक्ल देखकर उसके बारे में बता सकता हूं। राजा ने उसे अपने खास घोड़ों के अस्तबल का प्रभारी बना दिया। कुछ ही दिन बाद राजा ने उससे अपने सबसे महंगे और मनपसंद घोड़े के बारे में पूछा तो उसने कहा कि घोड़ा नस्ली नहीं है। राजा को हैरानी हुई, उसने जंगल से घोड़े वाले को बुलाकर पूछा तो उसने बताया कि घोड़ा नस्ली तो है, पर इसके पैदा होते ही इसकी मां मर गई थी। इसलिए ये एक गाय का दूध पीकर उसके साथ पला-बढ़ा है। राजा ने अपने नौकर को बुलाया और पूछा तुमको कैसे पता चला कि घोड़ा नस्ली नहीं है? उसने कहा कि जब यह घास खाता है तो गायों की तरह सर नीचे करके खाता है, जबकि नस्ली घोड़ा घास मुंह में लेकर सर उठा लेता है।
राजा उसकी काबिलियत से बहुत खुश हुआ और उसने नौकर के घर अनाज, घी, मुर्गे और ढेर सारी बकरियां बतौर इनाम भिजवा दिए। बाद में उसे रानी के महल में तैनात कर दिया। कुछ दिनों बाद राजा ने उससे रानी के बारे में राय मांगी। नौकर बोला कि तौर-तरीके तो रानी जैसे हैं, लेकिन पैदाइशी नहीं हैं। यह सुनते ही राजा के पैरों तले जमीन खिसक गई, उसने अपनी सास को बुलाकर इस बारे में पूछा। सास ने कहा कि ये हकीकत है कि आपके पिताजी ने मेरे पति से हमारी बेटी की पैदाइश पर ही रिश्ता मांग लिया था, लेकिन हमारी बेटी ६ महीने में ही मर गई थी, लिहाजा हमने आपके रजवाड़े से करीबी रखने के लिए किसी और की बच्ची को अपनी बेटी बना लिया।
राजा ने फिर अपने नौकर से पूछा, `तुमको वैâसे पता चला?’ उसने कहा- `रानी साहिबा का नौकरों के साथ सुलूक गंवारों से भी बुरा है, एक खानदानी इंसान का दूसरों से व्यवहार करने का एक तरीका होता है, जो रानी साहिबा में बिल्कुल नहीं है। राजा फिर उसकी पारखी नजरों से खुश हुआ और फिर से बहुत सारा अनाज, भेड़, बकरियां बतौर इनाम में दी। साथ ही उसे अपने दरबार में तैनात कर लिया। कुछ वक्त गुजरा, राजा ने फिर नौकर को बुलाया और अपने बारे में पूछा। नौकर ने कहा, `जान की सलामती हो तो कहूं।’
राजा ने वादा किया तो उसने कहा, `न तो आप राजा के बेटे हो और न ही आपका चलन राजाओं वाला है।’ राजा को बहुत गुस्सा आया, मगर जान की सलामती का वचन दे चुका था, राजा सीधा अपनी मां के महल पहुंचा। मां ने कहा कि ये सच है, तुम एक चरवाहे के बेटे हो, हमारी औलाद नहीं थी तो तुम्हे गोद लेकर हमने पाला। राजा ने नौकर को बुलाया और पूछा, बता, `तुझे वैâसे पता चला?’ तब उस नौकर ने कहा कि जब राजा किसी को `इनाम दिया करते हैं, तो हीरे मोती और जवाहरात की शक्ल में देते हैं लेकिन आप भेड़, बकरियां, खाने-पीने की चीजें दिया करते हैं। ये रवैया किसी राजा का नहीं, किसी चरवाहे के बेटे का ही हो सकता है।
नौ साल पहले किसी देश में किस्से-कहानियों के माध्यम से एक तथाकथित फकीर को परमप्रतापी, न भूतो न भविष्यति राजा की तरह पेश किया गया। उसने गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार दूर करने, काला धन वापस लाकर हर नागरिक के खाते में १५-१५ लाख भेजने के साथ अच्छे दिन लाने का जुमला फेंका और सत्ता के शीर्ष पर काबिज हो गया। अब उसे न महंगाई दिख रही है, न उनका भ्रष्टाचार, जिन पर खुद भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर बाद में अपने दरबार में शामिल कर लिया। कहानी का सारांश यह है कि किसी इंसान के पास कितनी धन दौलत, सुख समृद्धि, रुतबा, बाहुबल हैं ये सब बाहरी दिखावा है। इंसान की असलियत की पहचान, उसके व्यवहार और उसकी नीयत से होती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)

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