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एक बड़े राजनैतिक परिवर्तन के लिए २०२४ में भारत तैयार रहे!

सुषमा गजापुरे

परिवर्तन प्रकृति का नियम है। परिवर्तन जीवन की तरह ही स्वाभाविक है। बदलना हमारे स्वभाव में है, हम एक जैसे नहीं रहते। जीवन के हर अंग में आप हर पल बदलाव देखेंगे। अगर हम मानव जीवन को ६ प्रमुख भागों में बांटकर देखें तो पाएंगे कि हर भाग बदलाव से प्रभावित होता है। ये भाग हैं परिवार, अर्थ, स्वास्थ्य, शिक्षा, समाज और अध्यात्म। इसके अलावा सार्वजनिक जीवन में राजनीति, आर्थिक और सामाजिक अंग एक-दूसरे से गुथे हुए हैं। किसी एक वर्ग में परिवर्तन अन्य वर्गों में भी परिवर्तन को प्रेरित करता है। अगर हम आज के राजनीति, आर्थिक और सामाजिक परिदृश्य को देखें तो पाएंगे और महसूस भी होगा कि इस संक्रमण काल में नए परिवर्तन के बीज छुपे हैं। राजनैतिक रूप से नवंबर के ५ राज्यों के चुनाव और २०२४ के लोकसभा चुनाव आजाद भारत के सबसे अधिक प्रतीक्षित चुनाव होंगे। इसका कारण है कि पिछले १० वर्षों में भारत की सभी संस्थाएं या तो एक-एक करके ध्वस्त कर दी गर्इं या फिर जान-बूझकर पंगु बना दी गर्इं। जिस देश में स्वायत्त संस्थाएं पंगु बना दी गई हों तो उनका स्टील फ्रेम भी नष्ट हो जाता है और वो एक सभ्यताओं के विनाश काल में प्रवेश कर जाते हैं।
पिछले ७५ वर्षों में प्रदेशों के चुनावों में देश के प्रधानमंत्री कभी भी पूर्ण सक्रियता से भाग नहीं लेते रहे हैं। हां, एक दो रैली वो किसी एक प्रदेश में करके अपने पद के दायित्वों में रत हो जाते थे, लेकिन मोदी जी एक ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जो २४ घंटे प्रचारमंत्री के रूप में देश में जगह-जगह रैली करते ही रहते हैं। इस नई व्यवस्था को लोगों ने स्वीकार तो किया है, पर वो भी शायद अब इस प्रक्रिया और मोदी जी की अतिसक्रियता से सहमत नजर नहीं आ रहे हैं। जिस गुजरात मॉडल के दम पर मोदी जी सत्ता में आए, अब वही गुजरात मॉडल चरमराता नजर आ रहा है और उसके खोखलेपन का एहसास लोगों को होने लगा है।
देश में संभावित राजनैतिक परिवर्तन की कई मूल वजहें हैं। इनमें से एक सामाजिक बिखराव भी है। पिछले दस वर्षों में देश में धर्म की राजनीति को जिस तरह से परवान चढ़ाया गया और अल्पसंख्यकों में जिस तरह भय का वातावरण बनाया गया, वह शायद भारत की सेक्युलर जनता को पसंद नहीं आ रहा है। हालांकि, भारत में बहुसंख्यकों में एक ऐसा भी बड़ा वर्ग है जिसने तानाशाही, हिंदू राष्ट्रवाद, हिंदू कट्टरवादिता, घृणा और हिंसा को स्वीकृति दी है और जिन्हें भारत के मूल विविधता भरे चरित्र से नफरत भी है। मणिपुर में हुई हिंसा और आगजनी ने पूरे विश्व में हलचल पैदा की है। पिछले १०० वर्षों के किसी एक काल खंड में इतने धार्मिल स्थल नहीं जलाए गए होंगे, जितने मोदी के इस काल में जलाए गए। सामाजिक बिखराव के लिए मोदी सरकार की नीतियां पूर्णरूप से जिम्मेदार हैं और इस सामाजिक उथल-पुथल के कंपन भारत के चुनावों में पूर्णत: महसूस किए जा रहे हैं, जहां आनेवाले चुनावों को फिर से सांप्रदायिकता के आधार पर जीतने का प्रयास हो रहा है।
अर्थव्यवस्था दूसरा ऐसा भाग है, जिसमें आर्थिक असमानता अब सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती हुई नजर आ रही है। दौलत का कुछ हाथों में सीमित हो जाना एक बड़ी चिंता की बात है। अभी हाल ही में आई एक रिपोर्ट ने इस बात का खुलासा किया है कि हमारे सभी उद्योगों के वार्षिक लाभ में से ४६ प्रतिशत लाभ सिर्फ और सिर्फ २० कंपनियों में सिमटकर रह गया है। इसका मतलब ये हुआ कि देश के लाखों उद्योगों के पास कुल कॉर्पोरेट प्रॉफिट का मात्र ५४ प्रतिशत हिस्सा रह गया है। देश में के शेप्ड वृद्धि का ये एक शानदार उदाहरण है। १४० करोड़ लोगों में सिर्फ २० करोड़ लोग ऐसे हैं, जो संपन्न हैं और बाकी के १२० करोड़ दो वक्त की रोटी को भी मोहताज हैं। अभी भी हजारों उद्योग कोरोना काल की विभीषिका से बाहर नहीं निकल पाए हैं। ये एक अजीब सी त्रासदी है कि १२० करोड़ का जनसंख्या वर्ग आज भी जीवन के अतिभीषण संघर्ष के दौर से गुजर रहा है, जबकि २० करोड़ लोग एक अमीरी भरी जिंदगी जी रहे हैं।
बेरोजगारी और महंगाई ऐसे आर्थिक और सामाजिक कारण हैं, जो देश में राजनैतिक परिवर्तन की पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं। दूसरी तरफ देश के लोग मोदी के १० वर्षों के शासनकाल के बाद एक परिवर्तन की उम्मीद कर रहे हैं। ये सब इसलिए कि परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है। शायद अब वो लम्हा आ गया है, जहां भारत के नागरिक महसूस कर रहे हैं कि सबसे अहम लड़ाई इस वक्त लोकतंत्र को बचाने की है। देश में बढ़ती तानाशाही प्रवृतियां, संस्थाओं का ध्वस्त हो जाना, ब्यूरोक्रेसी का नतमस्तक हो जाना शायद उन बहुत से कारणों में से हैं, जो राजनैतिक परिवर्तन की ओर इशारा कर रहे हैं। ३ दिसंबर को वो पहले परिणाम आएंगे, जो २०२४ की पृष्ठभूमि लिखेंगे। शायद २०२४ एक ऐसा वर्ष होगा, जहां आजाद भारत के ७५ वर्षों की सबसे भीषण जंग हमें देखने को मिलेगी। हमें समय का इंतजार करना होगा।
(लेखिका प्रसिद्ध चिंतक, शिक्षाविद और वरिष्ठ साहित्यकार हैं)

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