मित्र उठा कलम

भूख पेट में छिड़ गई लड़ाई
ठेले-खोमचे हटे राहों से
होने लगा है बदरंग पसीना
आने लगी है दुर्गंध बाहों से
सड़ रहे समय के पुर्जे-पुर्जे
दिवस हत्यारा खिलखिला रहा है
रातें नींद को लगा रही आग
सपन ताप से बिलबिला रहा है
यमगण पड़े हैं मृत्यु के पीछे
लौट-लौट आ रही महामारी
सब मूक हैं मूक ही तो हैं सब
मुंह बंद रखने की है लाचारी
विभीषिकाओं ने बोला हमला
युद्ध-युद्ध खेल रहे हैं राजा
भस्माभूत हो रही नई सभ्यता
भग्नावशेष उगे ताजा-ताजा
कौन मितवा है कौन है दुश्मन
रोक-रोक पूछ रही मानवता
है ईश्वर किस कोने जा बैठा
हाथ थामे चल रही दानवता
हर हाथ मांगता है काम सखे
पग भी चल पड़ने को व्याकुल हैं
मित्र उठा कलम हम खोद डालें
नवल अंकुर उगने को आकुल हैं
-डॉ. एम.डी. सिंह

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