दर्द से यारी

दर्द मेरे अंतस से
अक्सर मैं रुबरु होता रहता हूं,
उभरता है जो समय-समय पर जीवन में मेरे !
कहने लगा मेरा वो हमसाया,
आज मुझे यह इतराकर कि
जन्म हुआ उसका बेशक
मेरे ही तन में मौजूद यादों में
देता रहता है जो तकलीफ,
मेरे ही मन को हरपल
जिसमें है अब बसेरा उसका !
मेरे ही मन में होते पल्लवित दर्द ने
शिकवा दिल की गहराई से किया कि
लड़ता है हर बार वो मुझसे,
मुझी से प्रेरणा पाकर हरदम,
जब दर्द से हो गया रिश्ता अटूट तो
फिर उसके वज़ूद से क्यूं है नफरत मुझे,
गई कहां संवेदना कवि ह्रदय की
जो दर्द को अपना ना बना सका,
विजय दर्द पर पाकर निरंतर,
नवयुद्ध की तैयारी लगा रहता!
किंतु दर्द भी है अत्याचारी बेहद जो
माने ना हार मेरी लाचारी से
बारम्बार उठने का उसके,
जब कारण मैंने पूछा उससे तो
इठलाते हुए बतलाया उसने कि
हारकर उठने का सबक सीखा उसने,
मेरे ही अनथक प्रयासों से,
इसीलिए समयांतर पर दर्द मेरा,
उठ बार बार हमलावर होता !
समझने लग गया मैं भी अब
बारम्बार की मिलती पीडा से,
जो दुखी ना पहले जैसा अब होता हूं,
अपनी मुस्कराहट में छिपाए दर्द को
लज्जित मैं दर्द को बारम्बार करता हूँ!
ग़र दिखाए दर्द अपना किसी को
मलहम कोई देता नहीं यहां,
अलबत्ता काटने को आते लोग बहुत,
बस सोचकर यही सदा,
अन्दर अन्दर रो लेता हूं और
पीडा से लड़ने की हिम्मत
फिर से इकट्ठी कर लेता हूं !
घायल योद्धा की भांति
यादों की परछाई में खो जाता हूं,
बस इसी कशमकश में अक्सर,
दर्द से मैं बाते कर लेता हूं !
जीत गया दर्द मेरा अथवा
मैं हार कर भी जीत गया,
देख खिलखिलाता मस्ती में मुझे,
इर्ष्या तो होती होगी जरूर पीडा को,
मित्रता कर ली अब दर्द से मैंने,
और जीना उस मगरूर संग
अब सीख लिया जो मैंने।
-मुनीष भाटिया
मोहाली-पंजाब

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