" /> आंखों देखी….गंगाजल

आंखों देखी….गंगाजल

परिवार में जब भी कोई काशी-हरिद्वार की तीर्थयात्रा पर जाता तो लौटते वक्त गंगाजल ले आता। उसे हम घर में सहेज कर रख देते। गंगा सप्तमी-गंगा दशहरा पर उसका पूजन होता, अमावस्या-पूर्णिमा पर घर में छिड़काव होता, किसी बच्चे को नजर लगने का अंदेशा होता तो उस पर भी गंगाजल छिड़का जाता। मृत्युशय्या पर पड़े परिजनों को गंगाजल पिलाने की परंपरा है ही। वचन हेतु गंगाजल का सहारा लिया जाता है। कहीं किसी की शवयात्रा में शामिल होकर घर लौटने पर भी पहले गंगाजल छिड़का जाता है, तब घर में प्रवेश होता है। परम पावन गंगाजल हमारे जीवन का हिस्सा है।
सुबह-सुबह एक करीबी मित्र का फोन आया। ‘अभय, फलां आदमी नहीं रहे। हार्ट अटैक से उनकी मौत हो गई।’ वे मेरे अत्यंत करीबी के परिजन थे। आंख खुली ही थी और ये खबर मिली। लेकिन सच का सामना करना पड़ता है। घर से निकला। वहां पहुंचा। कोरोना नियमों के कारण बहुत कम लोगों को ही श्मशान तक जाने की अनुमति थी। हम कुछ गिने-चुने लोग पहुंचे। मैं अंतिम संस्कार में भाग लेकर घर लौट आया। घर की डोरबेल बजाई। पत्नी ने मुझपर गंगाजल छिड़का और मैं सीधे स्नान करने चला गया। अगले दिन सोशल मीडिया, फोन और मैसेज आदि से लगभग ४-५ लोगों के कोरोना से मौत की खबर आई। मन आहत हो गया। एक दिन बीता और खबर मिली कि हमारी इमारत की एक वृद्धा की लंबी बीमारी के बाद मौत हो गई। उनके अंतिम दर्शन किए और घर लौटा। फिर वही गंगाजल छिड़काव और स्नानादि का क्रम।
कोरोना काल की विषम परिस्थितियों में लोगों से मिलना नहीं हो पा रहा है। लेकिन एक बात मन को सुकून देती है कि जो जहां से जितनी, और जैसी भी मदद कर सकता है, कर रहा है। पत्रकार होने के नाते मुझे भी फोन आते रहते हैं। कभी ऑक्सीजन के लिए, कभी रेमडेसिवीर इंजेक्शन के लिए और कभी कोविड सेंटर में बेड उपलब्धि के लिए। हम मीडिया के लोग समन्वयन करके जानकारी उपलब्ध करवा देते हैं। अपनी ओर से पूरा प्रयास करते हैं लेकिन हर बार व्यवस्था हो ही जाती है, ऐसा भी नहीं है।
प्रसिद्ध साइकलिस्ट हीरालाल यादव को नागालैंड से दिल्ली की साइकल यात्रा के बीच कोरोना ने अपनी चपेट में ले लिया। वे आगरा के एक अस्पताल में भर्ती थे। वहां से फोन आया। उन्हें वेंटिलेटर की आवश्यकता थी। वहां मेरा कोई परिचित नहीं था। फिर भी उनके करीबी सीए पंकज जायसवाल और मैंने ज्यादा से ज्यादा व्हॉट्सऐप संदेश भेजे। सोशल मीडिया पर गुहार लगाई। एक-दो संपर्क मिले। मुंबई से समन्वयन की पूरी कोशिश की गई। आपको बता दें कि हीरालाल यादव का मुंबई में पहला इंटरव्यू ‘दोपहर का सामना’ ने प्रकाशित किया था। वे कन्या भ्रूण हत्या के विरोध में, युद्धबंदियों के पक्ष में, पर्यावरण के बचाव में साइकिल पर तिरंगा लहराते हुए भारत यात्रा करते थे। २६/११ के हमले में शहीद मेजर उन्नीकृष्णन के माता-पिता के साथ इंडिया गेट से गेटवे ऑफ इंडिया तक की यात्रा में हीरालाल यादव की सहभागिता रही। मुंबईकरों ने उन सभी का भव्य स्वागत किया था। मैं उन स्मृतियों में तल्लीन ही था कि ये क्या! खबर मिली कि हीरालाल यादव का देहांत हो गया। हमारे सारे प्रयास धरे के धरे रह गए।
इधर तमाम मीडिया के साथी आपस में एक-दूसरे को दिलासा देते हैं। ‘अपना ख्याल रखना। विकट परिस्थिति है’, वगैरह-वगैरह। लेकिन फिर अपना दायित्व निभाने घर से निकल पड़ते हैं। पिछले साल और इस साल कई पत्रकारों को कोरोना ने हमसे छीन लिया। अखबार पढ़ते समय और खबरिया चैनल देखते समय पत्रकारों को गरियाना आसान होता है लेकिन ये भी नहीं भूलना चाहिए कि वे भी कोरोना योद्धा हैं। उनका भी परिवार है। उनके भी सपने हैं। वे अपने पत्रकारिता धर्म को निभाने ही घर से निकलते हैं।
खैर, हमें तो तब ही सचेत हो जाना चाहिए था जब हमने बोतलबंद पानी बेचना शुरू कर दिया था। सचेत तब भी हो जाना चाहिए था जब हमने पेड़ काटने शुरू किए और पहाड़ों का उत्खनन शुरू किया। सचेत तब भी हो जाना चाहिए था जब हमने पर्यावरण का विभिन्न तरीकों से दोहन शुरू कर दिया था। अब भी समय है। हमें जागना होगा। जागरूक होना होगा। फिलहाल कोरोना से लड़ाई जरूरी है। बचेंगे तो आपस में लड़ने के बहुत मौके मिलेंगे। सरकार, प्रशासन और पुलिस की मदद करते हुए नियमों का पालन करें। अपनी और अपने परिवार की रक्षा करें। ‘दो गज की दूरी, मास्क है जरूरी’ और ‘मेरा परिवार-मेरी जिम्मेदारी’ जैसे घोषवाक्य आपकी-हमारी सुरक्षा की जिम्मेदारी का अहसास दिलाने के लिए हैं।
एक बात और। आजकल फोन या मैसेज आते ही मन धक-सा हो जाता है। सोशल मीडिया मौत की खबरों से पटा पड़ा है। नकारात्मक खबरों का अस्तिव गहराता जा रहा है। घर-बाहर हर ओर खौफ का मंजर है।
अभी एक पत्रकार साथी की मौत की खबर मिली। परिसर में ही रहते थे। वहां भी जाकर आया। घर में प्रवेश के पहले गंगाजल का छिड़काव और फिर नित्य कर्म हुआ। घर के भीतर दरवाजे के पास ही सेनिटाइजर, मास्क और भाप लेने की मशीन रखी गई है।
अब उसमें एक चीज और जुड़ गई है, गंगाजल!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक मुद्दों के समीक्षक और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)