मुख्यपृष्ठस्तंभकांग्रेस अध्यक्ष चुनाव : गहलोत को मिलेगा वफादारी का इनाम!

कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव : गहलोत को मिलेगा वफादारी का इनाम!

कविता श्रीवास्तव /मुंबई  अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए इन दिनों अच्छी खासी गहमागहमी चल रही है। पार्टी वफादारों में अव्वल और गांधी परिवार के बेहद करीबी राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को अध्यक्ष की रेस में सबसे आगे माना जा रहा है। हालांकि राजस्थान में उनके घोर प्रतिद्वंद्वी और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने की चर्चा ने घमासान मचा दिया है। पायलट के नाम का विरोध करते हुए गहलोत समर्थक विधायकों ने बीते रविवार को पार्टी विधायक दल की अधिकृत बैठक में भाग नहीं लिया। कांग्रेस मुख्यालय से भेजे गए पर्यवेक्षक अजय माकन और मल्लिकार्जुन खड़गे से गहलोत समर्थक विधायक मिले भी नहीं। उन सभी ने अलग बैठक लेकर इस्तीफा देने की धमकी तक दे दी। गहलोत खेमे द्वारा राजस्थान के मुख्यमंत्री पद की दावेदारी न छोड़ने और बागी तेवर अपनाने की इस कवायद ने राजनीतिक भूचाल ला दिया। वे सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने के आलाकमान के प्रयासों के खिलाफ हो गए। यहीं से कांग्रेस में जबरदस्त गहमागहमी शुरू हो गई। ‘एक व्यक्ति एक पद सिद्धांत’ के फॉर्मूले पर गहलोत को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने पर राजस्थान के मुख्यमंत्री का पद तो छोड़ना ही होगा। वे किसी एक पद पर ही रह सकते हैं। गहलोत की जगह राजस्थान के मुख्यमंत्री पद पर सचिन पायलट का नाम अभी भी सबसे ऊपर चल रहा है। वे गुर्जर समाज से हैं। गुर्जर समुदाय का बड़ा वर्ग कांग्रेस के साथ है। सचिन पायलट के पिता राजेश पायलट भी कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे। वे केंद्र में मंत्री रहे हैं। सचिन पायलट खुद भी केंद्र में मंत्री पद संभाल चुके हैं। वे सबसे कम आयु के सांसद भी रहे हैं। राजस्थान कांग्रेस कमेटी के वे अध्यक्ष भी रह चुके हैं। वे युवा नेता हैं। वर्तमान में उन्हें राजस्थान की कमान सौंप कर अगले साल होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस मजबूती से उतरने की तैयारियां कर रही है। लेकिन गहलोत समर्थक विधायकों ने तगड़ा विरोध जताकर व्यवधान उत्पन्न कर दिया। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में अशोक गहलोत ने स्वयं को बिल्कुल अलग ही रखा। मीडिया की खबरों ने कांग्रेसी विधायकों के बागी तेवर के पीछे उनकी भूमिका बताई। उनके जैसे वफादार कांग्रेसी के खेमे से बगावत की बू आने से उन पर भी प्रश्नचिह्न लगाए गए। लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने इस पर जबरदस्त दखल दी और मामले को बखूबी संभाल लिया है। अशोक गहलोत ने पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिलकर अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है। गहलोत का कहना है कि उन्होंने विधायकों से ऐसी बैठक न लेने और अपने क्षेत्र में जनता के काम को महत्व देने के लिए कह दिया था। कांग्रेस के पर्यवेक्षकों ने अशोक गहलोत को इस मामले में क्लीन चिट देकर उनका आगे का रास्ता साफ कर दिया है।
दरअसल अजय माकन और मल्लिकार्जुन खड़गे जब नई दिल्ली से जयपुर पहुंचे तो वे सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने के लिए विधायकों को मनाना चाहते थे। लेकिन गहलोत समर्थकों ने अलग बैठक करके इस्तीफे की चेतावनी दे दी। यह एक तरह से पार्टी के प्रति बगावत भरा कदम हुआ। इससे यही समझा गया कि निश्चित तौर पर यह सब अशोक गहलोत की सहमति और उनके आशीर्वाद से ही हुआ होगा।

राजस्थान में कांग्रेस बहुमत के साथ सत्ता में है। लेकिन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट की आपसी प्रतिद्वंद्विता जगजाहिर है। पार्टी अब गहलोत को अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना चाहती है और राजस्थान का मुख्यमंत्री सचिन पायलट को।

उल्लेखनीय है कि राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफे के बाद से ही कांग्रेस अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष पद को लेकर लंबे इंतजार में है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने अध्यक्ष बनने से इंकार कर दिया है। सोनिया गांधी फिलहाल अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर पार्टी संभाल रही हैं। इस बार गांधी परिवार से किसी के चुनाव में न खड़ा होने से कांग्रेस के सर्वेसर्वा समझे जाने वाले अध्यक्ष पद को लेकर देश के राजनीतिक परिदृश्य में भारी उत्सुकता है। जिन लोगों को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के कयास लगाए जा रहे हैं, उनमें सबसे ऊपर अशोक गहलोत का नाम ही है। वे पार्टी के महासचिव, सांसद, राजस्थान के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। वे गांधी परिवार के बेहद करीबी और पार्टी के एकदम वफादार अनुभवी नेताओं में हैं। वे पार्टी के शीर्ष पद के लिए गांधी परिवार के उम्मीदवार ही समझे जाते हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों का अनुमान है कि कांग्रेस आलाकमान ने गहलोत को केंद्र में पार्टी संगठन का मुखिया बनाने के साथ ही राजस्थान में सीएम पद पर उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट का नाम लगभग तय कर लिया है। पार्टी के आब्जर्वर राजस्थान के विधायकों के पास यही संदेश लेकर गए थे। इसी बात से अधिकांश विधायक नाराज हो गए। उनकी शर्त थी कि गहलोत मुख्यमंत्री बने रहें या फिर उनके खेमे से किसी को मुख्यमंत्री बनाया जाए। नहीं तो पार्टी का नया अध्यक्ष बनने तक मुख्यमंत्री बनाने का कोई फैसला न हो। नया अध्यक्ष आने के बाद फैसला हो और वही अगले मुख्यमंत्री का चयन करे। लेकिन किसी भी हालत में सचिन पायलट को मुख्यमंत्री न बनाया जाए। क्योंकि सचिन पायलट २०२० में अपनी ही सरकार के खिलाफ बगावत का प्रयास कर चुके हैं। इससे पहले २०१८ में जब राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बन रही थी तब भी गहलोत और सचिन पायलट के बीच लंबी रस्साकशी चली थी। इधर ताजा घटनाक्रम में सचिन पायलट एकदम खामोश हैं। वे सोनिया गांधी से मिलने दिल्ली पहुंचे। उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के प्रयासों के बीच जयपुर व अन्य जगहों पर उनके समर्थकों ने पोस्टर भी लगवा दिए। इसमें लिखा था ‘नए युग की शुरुआत।’

फिलहाल राजस्थान में कांग्रेस के सामने दो बड़ी समस्या है। एक वह मध्य प्रदेश का इतिहास दोहराना नहीं चाहती है। वहां ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत से कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार गिर गई थी। दूसरी तरफ पंजाब में मुख्यमंत्री बदलने से बहुमत होने के बावजूद चुनाव में कांग्रेस की भारी पराजय हुई और हाथ से सत्ता चली गई। राजस्थान में वैसी गलतियों से कांग्रेस बचना चाहती है। इधर कांग्रेस अध्यक्ष पद की रेस में अब पवन बंसल, शशि थरूर, अंबिका सोनी, मल्लिकार्जुन खड़गे, दिग्विजय सिंह, कुमारी शैलजा, मुकुल वासनिक, मीरा कुमार, एके एंटोनी के नाम भी सामने आए हैं। लेकिन अशोक गहलोत अब भी रेस से बाहर नहीं हैं। कांग्रेस के वफादार अशोक गहलोत सबसे तगड़े प्रत्याशी हैं। राजस्थान में बगावत की ताजा चिंगारी को बुझा कर पार्टी आलाकमान के पक्ष में सबको तैयार करने की ‘जादूगरी’ भी अशोक गहलोत ने दिखा दी है।

इसलिए संभव है कि अशोक गहलोत ही कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर आसीन होंगे। साथ ही पार्टी हित में सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने के लिए राजस्थान के विधायक एकजुटता दिखाएंगे। इससे आगामी वर्ष में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस फिर से बहुमत के लिए पूरी ताकत से उतरेगी। इस बीच अशोक गहलोत के समर्थन में उतरे उनके ही गुट के तीन विधायकों को पार्टी ने अनुशासनहीनता भंग करने के आरोप में कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है। इससे साफ है कि पार्टी सख्त है और अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं करेगी। कांग्रेस हाईकमान ने राजस्थान में जबरदस्त तरीके से स्थिति पर काबू पाकर अपनी मजबूत पकड़ सिद्ध कर दी है।

ध्यान रखना चाहिए कि गांधी परिवार के बलिदान और त्याग का इतिहास रहा है। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या की गई। सोनिया गांधी ने हर बार प्रधानमंत्री बनने से इंकार किया। अपने बेटे को भी प्रधानमंत्री नहीं बनाया। राहुल गांधी ने कभी कोई मंत्री पद भी नहीं लिया। उन्होंने चुनावी पराजय की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेकर पद से इस्तीफा दे दिया।

आज भी राहुल गांधी सड़कों पर उतर कर आम जनता के बीच पहुंच रहे हैं। वे जन-जन से संवाद करके ‘भारत जोड़ो’ का नारा लेकर निकले हैं। वे महंगाई, बेरोजगारी और किसानों की समस्याओं को लेकर केंद्र से भिड़ने का साहस करते हैं। इसलिए वे भाजपा की आंखों की किरकिरी बने हुए हैं। उनका उपहास करके भाजपा अपनी खीझ उतारने के अलावा कुछ नहीं करती। कांग्रेस आलाकमान अनुशासन के मुद्दे पर अपने मुख्यमंत्री और वर्षों के वफादार को भी नहीं बख्शती है। राजस्थान के ताजा घटनाक्रम से यही तथ्य सामने आया है। इससे कांग्रेस कमजोर नहीं और भी मजबूत नजर आती है।
(लेखिका स्तंभकार एवं सामाजिक, राजनीतिक मामलों की जानकार हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

अन्य समाचार