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जेनरिक का प्रसार हो, पर दवाओं की पुख्ता जांच भी हो! … एम्स के पूर्व निदेशक का सुझाव

इन दिनों देश में सस्ती जेनरिक दवाओं की चर्चाएं छाई हुई हैं। सरकार के दबाव के बावजूद डॉक्टर जेनरिक दवाएं लिखने को तैयार नहीं हैं। उधर महंगी दवाएं लेना कई मरीजों की औकात से बाहर की बात होती है। इस चक्कर में कई मरीजों की जान भी चली जाती है। हाल ही में एनएमसी ने डॉक्‍टरों के लिए एक कोड लागू की है, जिसमें सभी डॉक्टर्स को महंगी ब्रांडेड दवाओं का प्रिस्क्रिप्‍शन लिखने के बजाय सस्‍ती जेनरिक दवाएं लिखने के लिए कहा गया है। ऐसा न करने पर डॉक्‍टरों के खिलाफ कार्रवाई की भी बात कही गई है। उसी दिन से सस्ती जेनरिक बनाम महंगी ब्रांडेड दवाओं की क्‍वालिटी को लेकर बहस शुरू हो गई है। इस बारे में एम्स नई दिल्‍ली के पूर्व निदेशक डॉ. एमसी मिश्र की बात को ध्यान से समझने की जरूरत है।
डॉ. मिश्र का कहना है कि जेनरिक दवाओं का प्रसार होना चाहिए पर साथ ही इसकी क्वालिटी की पुख्ता जांच होने की भी जरूरत है। उनके अनुसार, कोई भी दवा बनाने में कई साल तक रिसर्च होती है। यह काम करनेवाली फार्मा कंपनी इसके लिए अपने विशेषज्ञ, मशीनरी और पैसा लगाती है, दवा का पेटेंट कराती है। जब दवा बन जाती है तो उसे अपनी कंपनी का ब्रांड नाम देकर बेचती है। यह पेटेंट वाली दवा ब्रांडेड कहलाती है और इसी वजह से ये दवाएं महंगी होती हैं। कुछ निश्चित साल के बाद जब वह पेटेंट प्रâी हो जाती है और उस दवा के साल्‍ट या सॉल्‍यूशन को आधार बनाकर कोई भी लाइसेंसशुदा फर्म इस दवा को बनाने लगती है और सस्‍ते दाम पर बाजार में उतारती है। यह दवा जेनरिक दवा कहलाती है। इसका कोई ब्रांड नहीं होता, सिर्फ साल्‍ट एक जैसा होता है। डा. मिश्र कहते हैं कि अब सवाल उठता है कि जेनरिक या ब्रांडेड कौन सी दवा मरीज के लिए बेस्‍ट है? तो यहां समझना होगा कि ये दोनों ही दवाएं मरीजों के लिए अच्‍छी हो सकती हैं बशर्ते दोनों की क्‍वालिटी सही हो। सबसे पहले ब्रांडेड की बात करते हैं, जब कोई कंपनी ब्रांडेड दवा बनाती है तो उससे उम्‍मीद की जाती है कि वह गुड मैन्‍यूपैâक्‍चरिंग प्रैक्टिसेज अपनाती है और सर्वोत्तम रिसर्च और रिजल्‍ट के साथ पेटेंट कराई हुई दवा उपलब्‍ध कराती है। ये दवा महंगी होती है लेकिन इसकी क्‍वालिटी को लेकर कम खतरा रहता है। लेकिन पेटेंट खत्‍म होने के बाद जब उसी साल्‍ट पर सामान्‍य फर्में दवा बनाने लगती हैं तो वहां क्‍वालिटी चेक की उम्‍मीद कम रहती है, जैसा कि हिंदुस्थान में देखने को मिलता है। ऐसा बड़ा नुकसान होने का खतरा होता है। इसके लिए जबतक कड़े नियम बनाकर उसे सख्ती से लागू नहीं किया जाता तबतक महंगी ब्रांडेड दवाओं का इस्‍तेमाल करना डॉक्‍टर और मरीज दोनों की ही मजबूरी बनी रहेगी।

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