घरौंदा

वक्त ‘बेवफा’ था या हम बेपरवाह थे
अब इस पर क्या गिला करना
किसे दोष देना, क्यों देना
ये तो यूं हुआ जैसे बच्चा कोई
समंदर किनारे घरौंदा बनाते बनाते
मन ही मन खुशी से फूल रहा होता है
कि अचानक रेत की आकृति ढह गई
मानों बच्चे का सपना ही
हकीकत में बदलते बदलते रह गया!
बच्चा भी किसे दोष देता
हवा को या समंदर की खारी लहर को
या अपने ही विफल प्रयास को!
अब रेत कुछ अधिक गीली हो चुकी थी
संध्या भी गहरा रही थी,
दोबारा घरौंदा खड़ा करने का साहस
बच्चा जुटा न पाया, खेद से भर गया दिल
मगर कतरा आंसू भी वो टपका न पाया
बड़ों की तरह बच्चे की मत
विचरने लगी मैं बड़ा होकर सपनों का घरौंदा नहीं,
हकीकत का भवन बनाऊंगा।
आज वही बच्चा तमाम नामी
बिल्डरों के झुंड में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।
-त्रिलोचन सिंह अरोरा

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