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गजल : तर्क-वितर्क

मन में तो बहुत कुछ है कहने को
पर यहां तैयार कौन बैठा है  सुनने को?
सब अपनी बात मनवाने पर तुले  हैं यहां
`वास्तविकता’से बेखबर चले आते  हमें आजमाने को।
`तर्क-वितर्क’ किसी भी सूरत में उचित नहीं है
मगर समझाए कोई वैâसे `डेढ़-सियानों’ को
अधूरे ज्ञान से `अज्ञानी’ होना बेहतर है
`गलत-संदेश’ सद ही `हानिकारक’ है समाज उठाने को।
जो है नहीं, वो दिखना चाहता है आदमी
कड़ा परिश्रम करना पड़ता है `पहचान’ बनाने को।
एक गलत उपदेश `गुमराह’ कर देता है `जिंदगियां’
व्यर्थ भाषण न झाड़ `त्रिलोचन’, तबाही मचाने को।
-त्रिलोचन सिंह अरोरा

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