गजल : रदीफ-हुई है

रदीफ-हुई है क़ाफ़िया
मुर्दा, दरिया, रस्ता वगैरह
न जाने बात तुझसे क्या हुई है
मगर जो भी हुई उम्दा हुई है
उड़े हैं रेत सूखी हर तरफ से,
मुहब्बत की जमीं सहरा हुई है।
है कितना खूबसूरत मंजरे इश्क
निगाहों में चमक पैदा हुई है
बहुत चाहा छुपाना इस जहां से
मुहब्बत मेरी बे-पर्दा हुई है
कनक दुनिया में जिंदा तो है इंसान
मगर इंसानियत मुर्दा हुई है
डॉ. कनक लता तिवारी

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