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गोबर से गांव हुआ `गदगद’! आधुनिक तकनीक से बनाए जा रहे हैं उपले

महिलाएं कर रही वनवासी गांव का नाम रोशन
३०० रुपए तक रोजाना हो रही है आमदनी
योगेंद्र सिंह ठाकुर / पालघर। गाय का गोबर रोजगार का जरिया बनता जा रहा है। गोबर सिर्फ उपले, खाद या बॉयोगैस बनाने के ही काम नहीं आता, बल्कि इसी गोबर से रोजमर्रा के लिए उपयोगी कई वस्तुएं भी बन सकती हैं।
वैसे तो गाय के गोबर का र्इंधन के रूप में और धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल होता रहा है। लेकिन पालघर की ग्रामीण महिलाओं ने इसे रोजगार का बेहतरीन जरिया बना लिया है। श्री गुरुजी अस्पताल, नासिक द्वारा संचालित सेवा संकल्प समिति के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को रोजगार उपलब्ध करवाने के लिए पशुओं के गोबर को एक विशेष सांचे में एकत्रित कर उपला (कंडा) बनाने की एक अनूठी पहल की गई है। इसकी शुरुआत जव्हार तालुका के वनवासी गांव से की गई है। कृषि क्रांति ने इस गांव में आमूलचूल परिवर्तन ला दिया है। इस गांव के लोगों को उनकी कड़ी मेहनत और आधुनिक तकनीक के लिए ‘कृषि रत्न’, ‘कृषि भूषण’ जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले हैं।
वनवासी गांव में बड़ी संख्या में पशुधन की उपलब्धता के कारण सेवा संकल्प समिति के माध्यम से वनवासी गांव की ४५ आदिवासी महिलाओं के लिए एक विशेष प्रकार का सांचा तैयार करवाकर उन्हें दिया गया है। इसमें गोबर से उपला बनाने का प्रशिक्षण भी दिया गया है, ताकि वे स्वरोजगार कर सकें। महिलाएं उपला बनाकर एक उपले को ६ रुपए तक बेच रही हैं। इससे उन्हें रोजाना ३०० रुपए तक कमाई हो रही है।
सेवा से निकला रास्ता
लोगों का कहना है कि पशुधन के गोबर से उपले बनाने से जहां महिलाओं को रोजगार मिलेगा, वहीं गाय की सेवा सहित पशुधन का संरक्षण होगा। हिंदू धर्म में गाय की सेवा को पुण्य का काम माना जाता है। ग्रामीण महिलाओं द्वारा सेवा से स्वरोजगार का रास्ता निकालने की जमकर प्रशंसा हो रही है।
कंडे होते हैं फायदेमंद
वैज्ञानिक कहते हैं कि गाय के गोबर में विटामिन बी-१२ प्रचुर मात्रा में मिलती है। यह रेडियोधर्मिता को भी सोख लेता है। आम मान्यता है कि गाय के गोबर के कंडे से धुआं करने पर कीटाणु, मच्छर आदि भाग जाते हैं तथा दुर्गंध का नाश हो जाता है। कंडे पर रोटी और बाटी को सेंका जा सकता है।
नवरात्रि से बढ़ी उम्मीद
गोबर के कंडे का प्रयोग पूजा-पाठ में होता है। ऐसे में आनेवाली नवरात्रि में कंडे की मांग बढ़ सकती है। मां दुर्गा की पूजा के दौरान भी गोबर के कंडों का धुंआ करना बहुत ही शुभ और लाभकारी माना जाता है। नवरात्र के दौरान गोबर के कंडे का प्रयोग किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। इसलिए यहां की महिलाएं पशुधन को संभालने की कला में पारंगत हैं।

गोबर इकट्ठा करना और उससे उपले बनाना एक नियमित कार्य है। यह बहुत उत्साहित करनेवाला है कि इससे गांव की ४५ महिलाओं को रोजगार मिला है।
-लता कालू महाले, स्थानीय निवासी

ग्रामीण महिलाएं इस बात से संतुष्ट हैं कि वे गांव में काम करके रोजगार पा सकेंगी और कुछ पैसे कमा सकेंगी।
-सोमीबाई महादू किरकिरे, स्थानीय निवासी

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