मुख्यपृष्ठस्तंभमुंबई मिस्ट्री : गोस्वामीजी और उनकी ‘हनुमान चालीसा’!

मुंबई मिस्ट्री : गोस्वामीजी और उनकी ‘हनुमान चालीसा’!

विमल मिश्र। काशी के संकटमोचन मंदिर में बजरंगबली स्वयं गोस्वामी तुलसीदासजी के निवेदन पर पधारे और विराजे हैं। हनुमानजी ही गोस्वामीजी के ‘रामचरितमानस’ और ‘हनुमान चालीसा’ की रचना के प्रेरणा स्रोत हैं। पर यह स्पष्ट नहीं है कि उनके अन्य ग्रंथों की तरह ‘हनुमान चालीसा’ की रचनाभूमि कहां है? काशी में ही या अन्यत्र!
काशी में संकटमोचन मंदिर आना वैसा ही है, जैसे आगरा जाकर ताजमहल आना। बताते हैं, हनुमानजी ने रामभक्त गोस्वामी तुलसीदास को इसी मंदिर में दर्शन दिए थे और मंदिर का संस्थापक भी गोस्वामीजी को ही बताया जाता है। ‘रामचरितमानस’ और ‘विनय पत्रिका’ सहित तुलसीदासजी ने अपने अधिकांश ग्रंथ काशी में ही लिखे। इसलिए आम विश्वास यही है कि ‘हनुमान चालीसा’ भी उन्होंने काशी में ही लिखी होगी। उस एक किंवदंती को छोड़कर, जो इसकी रचना मुगल सम्राट अकबर की वैâद के अनुभवों से प्रेरित बताती है। हालांकि इस बारे में भी पक्की जानकारी नहीं मिलती कि गोस्वामीजी ने ‘हनुमान चालीसा’ फतेहपुर सीकरी में इसी वैâद के दौरान लिखा, या वापस काशी आकर, या फिर और कहीं।
इस कथा के अनुसार एक बार जब मुगल सम्राट अकबर ने तुलसीदासजी को शाही दरबार में बुलाया था। इस दौरान उनकी भेंट अकबर के नवरत्नों में गिने जाने वाले अब्दुल रहीम खानखाना और टोडरमल से हुई, जिन्होंने गोस्वामीजी से बादशाह की शान में कुछ लिखने को कहा। उन्होंने मना कर दिया। इसके बाद उनकी भेंट अकबर से हुई, जिन्होंने उनसे कहा कि ‘मुझे भगवान श्रीराम से मिलवा दो।’ तुलसीदासजी ने जब यह कहा कि ‘भगवान श्री राम केवल भक्तों को ही दर्शन देते हैं।’ तो आग-बबूला होकर अकबर उन्हें कारागार में डलवा दिया। इस पर वानरों ने फतेहपुर सीकरी में तुलसीदासजी जिस स्थान पर वैâद थे वहां प्रवेश करके पहरेदारों पर हमला बोल दिया। यह बात पता चलने पर अकबर ने तुलसीदासजी को रिहा कर दिया।
यह भी कहा जाता है कि जब पहली बार तुलसीदासजी ने ‘हनुमान चालीसा’ का वाचन किया तो सबसे पहले इसे सुनने वाले थे हनुमानजी खुद, जो एक वृद्ध व्यक्ति के रूप में वहां उपस्थित थे। उनके ‘हनुमानाष्टक’ में तो आपको ‘संकटमोचन’ भी मौजूद मिलेंगे। गोस्वामीजी के ‘हनुमान बाहुक’ ग्रंथ के पीछे भी हनुमानजी से जुड़ा ही एक अन्य प्रकरण प्रसिद्ध है। कहते हैं कि एक बार गोस्वामीजी की बांह में बहुत कष्ट था। पीड़ा के असह्य होने पर हनुमानजी से उन्होंने शिकायत की कि `आप सभी के संकट दूर करते हैं, मेरा कष्ट दूर नहीं करेंगे!’ बताया जाता है कि यह ग्रंथ लिखने के साथ ही उनकी पीड़ा खुद ही समाप्त हो गई।
गोस्वामीजी ने विश्वप्रसिद्ध सिद्ध पीठ ‘संकटमोचन’ के अलावा काशी में अन्य १२ हनुमान मं‌दिरों की भी स्थापना की, जो हनुमान फाटक, मणिकर्णिका, पंचगंगा, नीचीबाग, तुलसी घाट, भदैनी, नरिया, तुलसी घाट, मीर घाट, वृद्धकाल, राजमंदिर और कर्णघंटा पर हैं।
‘हनुमान चालीसा’ के लाउडस्पीकर पर पाठ को लेकर राजनीतिक दलों में जो मौजूदा विवाद चल रहा है उसे लेकर खुद हनुमानजी की संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभरनाथ मिश्र – जिन्हें गोस्वामीजी का वंशज भी माना जाता है -बहुत क्षुब्ध हैं। ‘कम से कम, हनुमानजी को तो राजनीति से बख्श दो!’, महंतजी का मानना है कि यह देश संविधान से चलता है। हर धर्म का अपना नियम है, विधान है और सभी को अपने धर्म के पालन की छूट है। अगर किसी को किसी तरह की दिक्कत है तो शंकराचार्य हैं, उनसे बात कर सकते हैं। कोर्ट है, फरियाद लेकर वहां जा सकते हैं। उनका कहना है, ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ करने के नियम व सिद्धांत हैं। उनका ही पालन करना चाहिए। भगवान केवल भाव देखते हैं, उसका माध्यम लाउडस्पीकर ही हो, यह जरूरी नहीं है। इसलिए ‘हनुमान चालीसा’ को किसी राजनीतिक विवाद का एजेंडा नहीं बनाया जाना चाहिए।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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