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सरकारी नियमों की उड़ रही धज्जियां : बस्तों के बोझ से कराह रहा बचपन!

देश के भविष्य को बीमार कर रहा भारी बस्ता
योगेंद्र सिंह ठाकुर / पालघर
किताबों के बीच सिसकते बचपन ने शिक्षा की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है। एक छोटे बच्चे के लिए दस-बारह किताबें रोज स्कूल ले जाना और उन्हें पढ़ना कठिन होता है, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। नियमों का सख्ती से पालन न किए जाने से बस्तों के बोझ तले दबकर बचपन कराह रहा है।
बच्चों की पीठ, कंधे, गर्दन और सिर दर्द को लेकर अभिभावक डॉक्टरों के पास पहुंच रहे हैं। शिकायतें स्कूल प्रशासन तक भी पहुंच रही हैं, लेकिन निजी प्रकाशनों की मोटी-मोटी किताबों से कमाई में जुटे स्कूल कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हैं। अब हालात ऐसे हो गए हैं कि बस्ते के बढ़ते अनावश्यक बोझ से बच्चे मानसिक रूप से कुंठित भी हो रहे हैं।
शिक्षा एवं स्मार्ट स्कूलों का दावा करने वाले प्राइवेट स्कूल, नर्सरी एवं प्राइमरी कक्षाओं में बस्ते के वजन को लेकर जारी नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाते दिख रहे हैं। छोटी कक्षाओं के बच्चों के बस्ते (बैग) का वजन भी बड़ी कक्षाओं के बच्चों से भारी है। इससे अधिकतर अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई करने वाले बच्चे बढ़ते बोझ की मार झेल रहे हैं।
शिक्षा निदेशालय ने एनसीईआरटी द्वारा जारी नई `स्कूल बैग २०२०’ की नीति के अनुसार, छात्रों के स्कूल बैग का वजन उनके शरीर के वजन का १० प्रतिशत ही होना चाहिए। शिक्षकों को बताना होगा कि किस दिन कौन सी किताब और नोटबुक लानी हैं। कक्षा २ तक होमवर्क नहीं दिया जाएगा।
न शिक्षा विभाग और न सरकार लगा पा रहे लगाम
प्राइवेट स्कूलों में मासूमों पर बस्ते का भार कम करने के लिए न तो शिक्षा विभाग और न सरकार कुछ कर पा रहे हैं। प्राइवेट स्कूलों की ओर से छोटे बच्चों के लिए अलग-अलग तरह की पुस्तकें, नोटबुक्स, ड्रॉइंग बुक आदि चला दी जाती हैं, जिससे भारी-भरकम बस्तों के बोझ तले बचपन दब रहा है। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन २०२२ में प्रकाशित एक अध्ययन में छात्रों के वजन का १६.५ फीसदी बैग का वजन पाया गया। शोध में शामिल ५५.९ प्रतिशत बच्चों ने पूरे साल पीठ, कंधे या सिर दर्द की शिकायत की। इनमें से २१.३ फीसदी बच्चों के परिजन डॉक्टरों के पास भी गए।
कितना होना चाहिए बैग का वजन
पहली क्लास से दूसरी क्लास: बैग का वजन १.५ किलोग्राम होना चाहिए।
तीसरी क्लास से चौथी क्लास: बैग का वजन २ किलोग्राम से ३ किलोग्राम तक।
छठी क्लास से सातवी क्लास: बैग का वजन ४ किलोग्राम तक।
आठवीं क्लास से नौंवी क्लास: बैग का वजन ४.५ किलोग्राम तक।

प्राइवेट नर्सरी व प्राइमरी स्कूलों के छोटे बच्चों में बस्ते के बोझ के चलते कंधे में दर्द, गर्दन एवं पीठ में दर्द की बीमारी बढ़ रही है। जिन बच्चों में वैâल्सियम की कमी है, उनके लिए यह खतरनाक साबित हो रहा है। उनकी कार्यक्षमता भी कम हो रही है। ऐसे बच्चे हैं, जो हमेशा एक ही कंधे पर बस्ता रखकर स्कूल आते-जाते हैं, उनके कंधे में एक तरफ झुकाव की भी समस्या हो सकती है।
-डॉ. प्रशांत पाटील, पालघर
स्कूल बैग का वजन ज्यादा होने से बच्चे खुद बैग नहीं उठा पाते हैं। एक अभिभावक के रूप में मुझे लगता है कि स्कूलों को समयसारिणी का सख्ती से पालन करना चाहिए और बच्चों को अतिरिक्त कक्षाओं के लिए अतिरिक्त किताबें लाने के लिए नहीं कहना चाहिए। साथ ही स्कूलों में बच्चों के लिए लॉकर की व्यवस्था होनी चाहिए।
-चंद्रशेखर तिवारी, अभिभावक
स्कूल बैग का वजन ज्यादा होने से बच्चे नहीं उठा पाते हैं। स्कूल बस तक रोजाना बेटी का बैग लेकर जाना पड़ता है और फिर स्कूल की छुट्टी के होने के बाद बैग वापस लेकर भी आना पड़ता है।
-सुमित चौबे, पालघर

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