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`रोटी’ के बहाने बन रही थी गिनी पिग! … हिंदुस्थानी महिलाएं हो रही थीं शिकार

मनमोहन सिंह
बात १९६९ की है। ब्रिटेन के कोवेंट्री में रहने वाली दांती सोहंता अर्थराइटिस के दर्द से परेशान स्थानीय डॉक्टर के पास पहुंची। डॉक्टर ने दवा के बदले उनसे कहा कि यदि वह एक स्पेशल डाइट लेंगी तो उनकी तबीयत ठीक हो जाएगी। डॉक्टर की बात उन्होंने मान ली। अब हर रोज उनके घर पर रोटियां भेजी जाने लगीं। उनकी पड़ोसन प्रीतम कौर को माइग्रेन का दर्द था। उस डॉक्टर ने उन्हें भी वही राय दी। उनके घर में भी सुबह-सुबह रोटियां आने लगी। यह वह वक्त था जब ब्रिटेन में ये महिलाएं नई-नई पहुंची थीं, उन्हें अंग्रेजी का भी ज्ञान नहीं था। और फिर डॉक्टर तो डॉक्टर होता है उससे कोई सवाल क्यों करे?
गौरतलब है कि अलग-अलग बीमारी से परेशान २१ महिलाएं रोज विशेष रोटियां खाने लगीं। कुछ दिनों के बाद इन महिलाओं को अस्पताल में बुलाया गया टेस्ट करने के लिए। इन्हें यह पता नहीं था कि उनका ब्लड टेस्ट क्यों हो रहा है उन्हें किसी स्पेशल मशीन के भीतर क्यों डाला गया? ये भोली-भाली हिंदुस्थानी महिलाएं नहीं जानती थीं कि उनके भोलेपन का फायदा उठाकर उन्हें `गिनी पिग’ बनाया गया यानी वह एक खतरनाक मेडिकल रिसर्च का हिस्सा बन गई थीं। यह बात तब सामने आई जब लगभग २६ साल बाद चैनल ४ ने इस मुद्दे पर एक डॉक्यूमेंट्री प्रसारित की।
एक स्थानीय जनरल प्रैक्टिशनर के अनुसार, १९६९ में शहर की दक्षिण एशियाई आबादी में आयरन डिफिसियंसी के बाबत एक मेडिकल रिसर्च के तहत भारतीय मूल की करीब २१ महिलाओं को ‘आयरन-५९’ मिश्रित रोटियां खाने को दी गई थीं। ओवाटेमी ने कहा, ‘सितंबर में संसद की जब बैठक होगी, मैं इस पर सदन में चर्चा कराने की मांग करूंगी और उसके बाद इस बात की पूर्ण वैधानिक जांच की मांग करूंगी कि वैâसे यह होने दिया गया और महिलाओं की पहचान करने की एमआरसी (मेडिकल रिसर्च काउंसिल) की सिफारिश रिपोर्ट पर क्यों बाद में गौर नहीं किया गया?’ एमआरसी मेडिकल रिसर्च काउंसिल की तरफ से कहा गया कि १९९५ में चैनल४ पर डॉक्यूमेंट्री के प्रसारण के बाद उठाए गए प्रश्नों की जांच की गई थी।
बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, मामूली बीमारियों पर एक स्थानीय जनरल प्रैक्टिशनर की सहायता मांगे जाने के बाद २१ महिलाओं को स्टडी में शामिल किया गया था। दक्षिण एशियाई महिलाओं के बड़ी तादाद में रक्ताल्पता (एनीमिया) की चपेट में आने की वजह जानने के लिए यह स्टडी की गई थी। रिसर्चर्स को संदेह था कि पारंपरिक दक्षिण एशियाई आहार की वजह से इनके रक्त में लाल कोशिकाओं की कमी है। रिपोर्ट के अनुसार, आयरन-५९ मिश्रित रोटियां इन महिलाओं के घरों पर पहुंचाई गई थीं। इन महिलाओं को बाद में ऑक्सफोर्डशायर के एक अनुसंधान केंद्र में बुलाया जाता और उनमें रेडिएशन के स्तर का आकलन किया जाता। रिपोर्ट के अनुसार, एमआरसी ने कहा कि अध्ययन से साबित हुआ कि ‘एशियाई महिलाओं को आहार में अतिरिक्त लौह तत्व लेना चाहिए क्योंकि आटे में लौह तत्व घुलनशील नहीं है।
१९९५ में डॉक्यूमेंट्री के प्रसारण के बाद इन इश्यूज पर विचार किया गया और उस समय उठाए गए सवालों की पड़ताल के लिए स्वतंत्र जांच की गई। तो सवाल यह उठता है कि इस मामले में स्वतंत्र जांच की जरूरत क्यों पड़ी? स्वतंत्र जांच, डॉक्यूमेंट्री के प्रसारण के बाद ही क्यों की गई? और इस बात की क्या गारंटी रही कि जो जांच की गई उसमें निष्पक्षता बरती गई? वरना आज लगभग ५० साल के बाद सांसद ताइओ ओवाटेमी उस मेडिकल रिसर्च की वैधानिक जांच की मांग क्यों कर रही हैं?

५० साल बाद ब्रिटेन की संंसद में उठा सवाल
लगभग ५० साल बाद ब्रिटेन के विपक्षी दल लेबर पार्टी की एक सांसद ने १९६० के दशक में हुए एक मेडिकल रिसर्च की वैधानिक जांच की मांग की है, जिसके तहत हिंदुस्थानी मूल की महिलाओं को ‘आयरन की कमी’ (एनीमिया) की समस्या से निपटने के लिए `रेडियोएक्टिव आइसोटेप’ वाली रोटियां खाने को दी गई थीं। इंगलैंड के वेस्ट मिडलैंड क्षेत्र के कोवेंट्री की सांसद ताइओ ओवाटेमी ने ‘एक्स’ (ट्विटर) पर हाल में एक पोस्ट में किया और प्रभावित महिलाओं और उनके परिवारों की गहरी चिंता जताई।

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