मुख्यपृष्ठसमाचारकोविड हुआ था?... आजीवन फेफड़ों की बीमारी से पड़ेगा जूझना!

कोविड हुआ था?… आजीवन फेफड़ों की बीमारी से पड़ेगा जूझना!

-पोस्ट कोविड रिसर्च ने स्वास्थ्य तंत्र को चौंकाया

सामना संवाददाता / मुंबई

दुनियाभर में मौत का तांडव मचा चुकी कोरोना महामारी भले हिंदुस्थान में कंट्रोल में आ चुकी है, लेकिन आज भी इसका असर बरकरार है। कोरोना के शिकार हुए हिंदुस्थानियों ने इसे मात तो जरूर दे दी, लेकिन अब वे पोस्ट कोविड से परेशान हो चुके हैं और इनके फेफड़ों पर लंबे समय इसका असर दिखाई दे रहा है। हालिया अध्ययन में एक चौंकानेवाली जानकारी सामने आई है, जिसमें बताया गया है कि कोविड से उबरने वाले लोगों में एक महत्वपूर्ण अनुपात में फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी आई है और यह महीनों तक बरकरार है। इसके साथ ही यह भी देखा गया कि यूरोपियन और चीनियों की तुलना में हिंदुस्थानियों के फेफड़ों की कार्यक्षमता अधिक बिगड़ी है। कई मामलों में कुछ लोगों में एक साल के भीतर समस्या ठीक हो रही है, जबकि कुछ को आजीवन इस समस्या के साथ गुजरना पडेगा। वेल्लोर के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज द्वारा किया गया यह अध्ययन पीएलओएस ग्लोबल पब्लिक हेल्थ जर्नल में प्रकाशित किया गया है। इसमें कहा गया है कि फेफड़ों की कार्यप्रणाली पर कोविड के प्रभाव की जांच करनेवाला यह देश का सबसे बड़ा अध्ययन है। इसमें २०७ व्यक्तियों की जांच की गई है। अध्ययन में बताया गया है कोरोना से ठीक होने के दो महीने से अधिक समय के बाद हल्के, मध्यम और गंभीर कोविड से पीड़ित रोगियों के फेफड़ों की संपूर्ण कार्य परीक्षण, छह मिनट की वॉक टेस्ट, रक्त परीक्षण और जीवन की गुणवत्ता का आकलन किया गया। सांस से लिए गए ऑक्सीजन को रक्तप्रवाह में स्थानांतरित करने की क्षमता मापने वाले गैस ट्रांसफर यानी सबसे संवेदनशील फेफड़ों का कार्य परीक्षण करने पर पाया गया कि यह ४४ फीसदी प्रभावित हुआ है। इसके साथ ही ३५ फीसदी में प्रतिबंधात्मक फेफड़ों का दोष था, जो सांस लेते समय हवा के साथ फेफड़ों के फूलने की क्षमता को प्रभावित कर रहा था। इसके अलावा ८.३ फीसदी में अवरोध फेफड़े का दोष था, जो फेफड़ों में हवा के अंदर-बाहर जाने की सुगमता को प्रभावित कर रहा था।
धीरे-धीरे ठीक हो जाती है ९५ फीसदी रोगियों के फेफड़ों की क्षति
नानावटी अस्पताल में पल्मोनोलॉजी के प्रमुख डॉ. सलील बेंद्रे के अनुसार मध्यम से गंभीर संक्रमित हुए कोविड रोगियों के एक उपसमूह को संक्रमण के करीब ८-१० दिनों बाद अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता पड़ी। संक्रमण के बाद फेफड़ों के फाइब्रोसिस विकसित होने के लिए ऑक्सीजन समर्थन और स्टेरॉयड उपचार जारी रहा। उन्होंने कहा कि इनमें से लगभग ९५ फीसदी रोगियों के फेफड़ों की क्षति धीरे-धीरे ठीक हो जाती है। केवल ४-५ फीसदी लंबे समय तक स्थायी हानि से जूझते हैं।
सभी पहलुओं में हिंदुस्थानी मरीजों की स्थिति है बदतर
सीएमसी वेल्लोर के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर व अध्ययन के प्रमुख अन्वेषक डॉ. डीजे क्रिस्टोफर ने बताया कि सभी पहलुओं में हिंदुस्थानी मरीजों की स्थिति बदतर है। इसके अतिरिक्त चीनी और यूरोपीय लोगों की तुलना में बडी संख्या में हिंदुस्थानियों में मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी गैर संक्रामक बीमारियां थीं।

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