मुख्यपृष्ठस्तंभएक ‘गाली’ न पड़ती तो कसाब जिंदा नहीं पकड़ा जाता!

एक ‘गाली’ न पड़ती तो कसाब जिंदा नहीं पकड़ा जाता!

२६ नवंबर, २००८ की तारीख मुंबई के लोग कभी भुला नहीं सकते। इस रविवार पूरी दुनिया को दहला देनेवाले आतंकी हमले की पंद्रहवीं बरसी है। पाकिस्तान से आए दस आतंकियों ने मुंबई के अलग-अलग ठिकानों पर जमकर खून-खराबा किया था और कई लोगों को बंधक बना लिया था। करीब ५९ घंटों तक चले ऑपरेशन के बाद ९ आतंकियों को तो नर्कलोक भेज दिया गया लेकिन अजमल कसाब नाम के एक आतंकी को जिंदा पकड़ पाने में मुंबई पुलिस को कामयाबी मिली। कसाब के जिंदा पकड़े जाने से ही हमले की साजिश में पाकिस्तान की भूमिका पर से पर्दाफाश हुआ था। उस रात मुंबई पुलिस की एक गोली कसाब को भी ढेर कर देनेवाली थी, लेकिन उसके जिंदा पकड़े जाने की कहानी बड़ी दिलचस्प है।
२६ नंवबर की रात करीब ९ बजे दसों आतंकी दक्षिण मुंबई के बधवार पार्वâ से सटी मछुआरों की बस्ती के पास उतरने के बाद दो-दो के ग्रुप में बंट गए। एक ग्रुप ताज होटल गया, दूसरा ऑबेरॉय होटल, तीसरा लिओपॉल्ड वैâपेâ, चौथा नरीमन हाऊस स्थित यहूदी सांस्कृतिक वेंâद्र पहुंचा और पांचवा ग्रुप सीएसटी रेल स्टेशन। इन सभी ग्रुप्स के आतंकियों ने अपने-अपने तय ठिकानों पर पहुंचकर नरसंहार शुरू कर दिया। सीएसटी पर जो ग्रुप पहुंचा उसमें आतंकी अजमल कसाब और अबू इस्माइल थे। अबू इस्माइल पूरे दस लोगों के दस्ते का मुखिया भी था। सीएसटी पर कसाब और इस्माइल ने मुसाफिरों और पुलिसकर्मियों समेत करीब ६० लोगों की हत्या की और १०० के करीब लोगों को घायल कर दिया। इसके बाद दोनों सड़क पार करके कामा अस्पताल की गली में घुसे और वहां भी गोलीबारी की। इस बीच महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते के प्रमुख हेमंत करकरे, अतिरिक्त आयुक्त अशोक कामटे और इंस्पेक्टर विजय सालस्कर एक पुलिसिया क्वॉलिस कार में सवार होकर दोनों आतंकियों को ढूंढने उस गली में पहुंचे। अंधेरे का फायदा उठाकर दोनों ने क्वॉलिस पर घात लगाकर हमला किया। कामटे ने जवाबी फायरिंग करने की कोशिश की लेकिन तीनों शहीद हो गए। करकरे, कामटे और सालस्कर के शवों को क्वॉलिस से बाहर पेंâक कर दोनों ने गाड़ी अपने कब्जे में कर ली और नरीमन पॉइंट की तरफ बढ़े। इस्माइल ड्राईविंग सीट पर बैठा और कसाब उसके बगल में। गाड़ी जब विधान भवन के पास पहुंची तो इस्माइल ने महसूस किया कि एक टायर पंचर हो गया है। उसी वक्त अंधेरी के एक रेस्तरां व्यवसायी की स्कोडा वहां से गुजर रही थी। बंदूक की नोक पर दोनों ने उससे स्कोडा छीन ली। इस्माइल फिर से ड्राइविंग सीट पर बैठा। दोनों मरीन ड्राइव के रास्ते गिरगांव चौपाटी की ओर बढ़ने लगे। इस बीच मुंबई पुलिस के वंâट्रोल रूम ने अलर्ट जारी कर दिया कि दो आतंकी पुलिस की गाड़ी छीनकर भागे हैं। सभी पुलिस थानों को नाकेबंदी करने के लिए कहा गया। डी.बी. मार्ग पुलिस थाने ने भी गिरगांव चौपाटी पर वैâपेâ आइडियल चौराहे के पास नाकेबंदी लगा दी। इस बीच मरीन ड्राइव से गुजर रही स्कोडा कार पर पुलिसकर्मी तुकाराम ओंबले की नजर पड़ी।

चूंकि उस सड़क पर तब तक बाकी सभी वाहनों की आवाजाही बंद कर दी गई थी, इसलिए ओंबले को कुछ गड़बड़ लगा। उन्होंने अपनी मोटरसाइकिल से कार का पीछा करना शुरू कर दिया। इस्माइल जब कार लेकर गिरगांव चौपाटी पर पहुंचा तो सामने पुलिस की नाकेबंदी देखकर हड़बड़ा गया। उसने पुलिसकर्मियों को उलझाने के इरादे से कार की हेडलाइट जलाई और विंडशील्ड का वाइपर चालू कर दिया और वहीं से यू-टर्न लेने लगा। तभी ओंबले वहां पहुंच गए और उन्होंने इस्माइल के बगल में बैठे कसाब के गले को जकड़ लिया। लेकिन कसाब ने हाथ में मौजूद ए.के. ४७ का ट्रिगर दबा दिया और ओंबले वहीं शहीद हो गए। कसाब की ओर से चलाई गई एक गोली वहां मौजूद इंस्पेक्टर संजय गोविलकर के कमर को घिस कर गई। वे गिर पड़े और उनकी वर्दी खून से सन गयी। इस बीच नाकाबंदी में मौजूद इंस्पेक्टर हेमंत बावधणकर ने अपने रिवॉल्वर से इस्माइल के माथे पर एक गोली मार दी और वो वहीं ढेर हो गया। इसके बाद रिवॉल्वर का मुंह बावधणकर ने जैसे ही कसाब को मारने के लिए घुमाया, घायल हालत में ही संजय गोविलकर ने बावधणकर को एक गाली दी और मराठी में चिल्लाए, ‘ऐ बावध्या… त्याला मारू नकोस। त्याला जीवंत पकड़ूया। तो एविडेंस आहे रे…’ (उसको मारो मत, जिंदा पकड़ो। वो सबूत है।) ये कोई दुर्भावना वाली गाली नहीं थी, बल्कि आमतौर पर बोलचाल में दोस्त या सहकर्मी एक-दूसरे को देते हैं कुछ वैसी ही गाली थी। इसके बाद बावधणकर ने अपनी उंगली रोक ली। वहां मौजूद बाकी पुलिसकर्मियों ने, जो कि काफी गुस्से में थे, कसाब से ए.के ४७ छीन ली और फिर लाठी-डंडों से उसकी खूब पिटाई की। उसको गिरफ्तार कर लिया गया। कसाब का जिंदा हाथ आना मुंबई पुलिस के लिए सोने की खान मिलने की तरह था। उसी रात पूछताछ में कसाब ने उगल दिया कि पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा की ओर से उसे और उसके बाकी साथियों को आतंक की ट्रेनिंग दी गई थी और वैâसे सभी दस आतंकी समुद्री रास्ते से मुंबई पहुंचे थे। चार साल बाद कसाब को उसके बाकी नौ साथियों के पास भेज दिया गया जब २०१२ में पुणे की यरवदा जेल में फांसी दी गई। उसे जिंदा पकड़ने वाले हेमंत बावधणकर अब पुलिस सेवा से रिटायर हो चुके हैं, जबकि संजय गोविलकर सहार पुलिस थाने के वरिष्ठ पुलिस इंस्पेक्टर हैं।

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