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मजदूरों पर केंद्र सरकार का कहर : दोगुनी मेहनत में आधा पेट दाना!: मेहनतकश परिवारों का जीना हुआ दूभर

गोपाल गुप्ता / मुंबई
नरेंद्र मोदी के नेतृत्ववाली केंद्र की भाजपाई सरकार की गलत नीतियों की वजह से देश में बेरोजगारी और महंगाई लगातार बढ़ती ही जा रही है। पैसा कमाना जहां लोगों के लिए मुश्किल हो गया है, वहीं पेट्रोल- डीजल और गैस की कीमतों में हो रही बेतहाशा बढ़ोतरी की मार आम से लेकर खास तक सभी को बेहाल कर रही है। खाद्य पदार्थ और रोजमर्रा के जरूरत की सभी चीजों की कीमत आसमान छू रही हैं। इससे लोगों का बजट गड़बड़ाने लगा है। ऐसे हालात में सबसे बुरा हाल रोज श्रम करके रोजी-रोटी का जुगाड़ करनेवाले दिहाड़ी मजदूरों का हो रहा है। उनके लिए मुश्किल से मिले काम में दिनभर की मेहनत के बाद भी आधे पेट यानी एक वक्त के खाने का जुगाड़ मुश्किल हो गया है। इस महंगाई की वजह से मेहनतकश परिवारों का जीना दूभर हो गया है। हालांकि राज्य की महाविकास आघाड़ी सरकार मुफ्त राशन देकर राहत प्रदान करने की कोशिश कर रही है लेकिन रसोई गैस महंगा होने से मजदूरों के चूल्हे ठंडे पड़ने लगे हैं।
कोरोना काल में लॉकडाउन से परेशान लोग दलहन, खाद्य तेल व साग-सब्जियों के लगातार बढ़ते दामों की दोहरी मार सह रहे हैं। लॉकडाउन हटने के बाद लोग ‘अच्छे दिन’ की उम्मीद कर रहे थे लेकिन डीजल, पेट्रोल और गैस की बेतहाशा बढ़ती कीमतों ने महंगाई को चरम पर पहुंचा दिया। जिनके पास आय का बढ़िया साधन है, वे तो किसी तरह अपना बजट बैठा ले रहे हैं लेकिन दिहाड़ी मजदूर घर चलाने से परेशान हैं। तपती धूप में दिहाड़ी मजदूर अथक परिश्रम करने के बाद भी दो जून की रोटी का जुगाड नहीं कर पा रहे है। परिजनों का पेट भरने की चिंता उन्हें खाती है।
कोस रहे हैं मजलूम
झुग्गी-बस्तियों में रहनेवाले गरीब तबके के लोग महंगाई सहित केंद्र की गलत नीतियों को कोस रहे हैं। ऐसे ही एक दिहाड़ी मजदूर गोविंद मारियाल रोते हुए कहते हैं कि कई-कई दिनों तक इंतजार करने के बाद उन्हें काम मिलता भी है तो मजदूरी बहुत कम और समय पर नहीं मिलती है। ऐसे में परिवार का गुजारा मुश्किल से हो रहा है। उन्होंने बताया कि पहले इतने पैसे में काम चल जाता था लेकिन अबकी महंगाई में बच्चों की भूख भी नहीं मिट रही है। गेहूं-चावल तो राज्य सरकार द्वारा संचालित राशन की दुकानों पर मिल जाता है लेकिन तेल, सब्जी सहित अन्य सामान के लिए पैसे नहीं बचते हैं। इन दिनों एक किलो तेल २०० रुपए में बिक रहा है। उन्होंने कहा अब जैसी महंगाई कभी नही देखी। इसी तरह केसम्मा बेलपती के मुताबिक महंगाई ने रसोई का स्वाद फीका कर दिया है। उनको रुपए खर्च करने से पहले हजार बार सोचना पड़ रहा है। खाद्य सामग्रियों की मात्रा कम करके दिन काट रहे हैं। पहले जहां पांच किलो दाल में पूरे महीने चल जाता था, अब दो किलो से ही काम चला रहे हैं। वहीं युवा समाजसेवक यश माने का कहना है कि महंगे अनाज, तेल और महंगी सब्जियों ने भोजन का स्वाद बिगाड़ दिया है। बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही हैं। उन्हें पढ़ाएं या उनका पेट भरें यह दुविधा उनके सामने खड़ी हो गई है।

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