मुख्यपृष्ठस्तंभमध्यांतर : ‘भारत जोड़ो यात्रा' ... एमपी में आई भाजपा घबराई!

मध्यांतर : ‘भारत जोड़ो यात्रा’ … एमपी में आई भाजपा घबराई!

प्रमोद भार्गव। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ मध्य प्रदेश में सात दिन से चलर ही है। इस बीच सियासी घमासान इस कदर मचा है कि भाजपा जहां इस यात्रा के महत्व को कांग्रेसियों को भाजपा में शामिल कर फीका करने में लगी है, वहीं कांग्रेस भी बार-बार अपनी रणनीति में बदलाव कर इसको सफल बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही है। इस लिहाज से कांग्रेस नरम हिंदुत्व को तो दर्र्शाना चाहती है और विवादों से दूर भी रहना चाहती है। हालांकि इस यात्रा में जो अब तक बड़े विवाद देखने में आए हैं, उसमें एक तो वीर सावरकर पर राहुल का दिया गया बयान है, दूसरा वनवासी क्रांतिकारी टंट्या भील को दी जा रही फांसी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जोड़ना है। खंडवा के जिस निमाड़ क्षेत्र में टंट्या भील और उनका समुदाय निवास करते थे, वहां इंदौर के होल्कर शासक थे और वे अंग्रेजों के आधिपत्य में अपना शासन चला रहे थे। टंट्या जब अंग्रेजों के शोषण, दमन और धर्मांतरण से परेशान हो गए, तब उन्होंने अंग्रेजों से मुक्ति का शंखनाद कर दिया। उनका साथ वनवासियों के अलावा किसी ने नहीं दिया था।
दरअसल राहुल गांधी ने जब महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश में प्रवेश किया तो उनकी यात्रा में लाखों लोग शामिल हुए। इनकी संख्या दो लाख तक बताई जा रही है। आम सभा में भी करीब इतने ही लोग थे, जबकि मप्र पुलिस और उसकी गुप्तचर संस्थाओं का अनुमान अधिकतम चालीस से पचास हजार लोगों का था। बुरहानपुर में कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी भी शामिल हो गई थीं। राहुल गांधी की यात्रा जैसे ही मध्य प्रदेश पहुंची उसके बाद से भाजपा घबरा गई है। हालांकि कांग्रेस विरोधियों का तर्क है कि बुरहानपुर और उसका ग्रामीण इलाका मुस्लिम बहुल बताया जाता है इसलिए भाजपा से असंतुष्ट यह तबका यात्रा में नजर आया था। इसके बाद जब यात्रा इंदौर-मालवा क्षेत्र में प्रवेश कर गई तो यात्रा में लोगों की उपस्थिति कम होती चली गई। हालांकि इस पूरे क्षेत्र में कांग्रेस और भाजपा की असली लड़ाई वनवासी वोट बैंक को अपना बनाए रखने की है। इसीलिए टंट्या की जन्मस्थली ग्राम बड़ोदा में इस शहीद के स्मारक पर पहुंचकर राहुल ने श्रद्धांजलि दी और सभा को भी संबोधित किया। चूंकि भाजपा के वर्चस्व में आने से पहले तक वनवासी कांग्रेस की झोली में रहे हैं, इसलिए मध्य प्रदेश भाजपा को यह आशंका बनी रही है कि यह वोट राहुल की यात्रा से प्रभावित होकर कांग्रेस के पाले में न चला जाए?
अतएव इसकी तोड़ के लिए शिवराज सिंह चौहान सरकार ने १५ नवंबर से ही प्रदेश में आदिवासियों के संरक्षण से संबंधित पेशा-कानून के नए नियम लागू किए और जनजातीय समुदायों को जागरूक करने के लिए एक सम्मेलन भी आयोजित किया। दरअसल वर्चस्व की यह लड़ाई इसलिए लड़ी जा रही है, क्योंकि प्रदेश में जनजाति समुदाय के लिए ४७ विधानसभा सीटें सुरक्षित हैं। इसके अलावा ३७ विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जिनमें वनवासी समुदाय की निर्णायक भूमिका रहती है। इसलिए माना जाता है कि आज प्रदेश में सरकार उसी की बनेगी, जिस पर आदिवासी मेहरबान रहेंगे। इसलिए भाजपा और कांग्रेस इस समुदाय को लुभाने की पुरजोर कोशिश में लगे हैं। भाजपा बेचैन इसलिए है, क्योंकि संघ और भाजपा ने जितने भी चुनावी सर्वे कराए हैं, उनमें भाजपा की पराजय दिखाई गई है। नतीजतन संघ और भाजपा का एक खेमा यह भी राय बना रहा है कि क्यों न शिवराज सिंह चौैहान को बदलकर ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया जाए। लेकिन ऐसा करने पर भाजपा के अंदरूनी सर्वे ज्यादा नुकसान जताने वाले आए हैं। दरअसल शिवराज की अपनी जाति का वोट तो पूरे प्रदेश में है ही, पिछड़ा वर्ग के अन्य समुदाय भी उनके साथ हैं। अतएव भाजपा अजीब पशोपेश में है कि मुख्यमंत्री बदले अथवा नहीं?
इस यात्रा का महत्व फीका हो जाए, इस दृष्टि से भाजपा ने कांग्रेसियों के दल-बदल की रणनीति को भी अंजाम तक पहुंचा दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ के मीडिया समन्वयक रहे नरेंद्र सलूजा ने मुख्यमंत्री शिवराज की उपस्थिति में भाजपा की सदस्यता ग्रहण की। कमलनाथ पर सीधा आरोप लगाते हुए सलूजा ने कहा कि इंदौर में कीर्तनकारों ने कमलनाथ की १९८४ के दंगों को लेकर जो भूमिका बताई है, उससे यह मानता हूं कि उनमें कमलनाथ का हाथ था। जब तक उन्हें सजा नहीं मिल जाती, तब तक हम चुप नहीं बैंठेगें। सलूजा ने `भारत जोड़ो यात्रा’ कर रहे राहुल गांधी से अपील करते हुए कहा है कि आप नफरत और हिंसा के विरुद्ध यात्रा निकाल रहे हैं लेकिन ऐसे व्यक्ति को साथ लेकर चल रहे हैं, जिसके विरुद्ध दंगा करवाने के आरोप हैं। सलूजा ने कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाने की भी अपील की है। बता दें कि ८ नवंबर को इंदौर में गुरुनानक जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में सिख कीर्तनकार मनप्रीत सिंह कानपुरी ने कमलनाथ के स्वागत और सम्मान को लेकर विरोध जताया था। इधर चंबल अंचल में श्योपुर की विजयपुर सीट से पूर्व विधायक रहे बाबूलाल मेवरा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए हैं। हालांकि मेवरा भाजपा छोड़कर ही कांग्रेस में गए थे। मेवरा भी श्योपुर के उस इलाके से विधायक रहे हैं, जो सहरिया आदिवासी बहुल क्षेत्र रहा है। स्पष्ट है कि दोनों दलों में आदिवासी क्षेत्रों के मतदाताओं को लेकर जंग छिड़ी है।
हालांकि राहुल गांधी समझदारी बरतते हुए अपने संबोधनों में कह रहे हैं कि मेरे दिल में सिर्फ मोहब्बत है। मैं आरएसएस से लड़ता हूं, मोदी जी से लड़ता हूं परंतु इनके लिए मेरे मन में जरा सी भी नफरत नहीं है। राहुल गांधी आदिवासी समाज को भी साधने में जुटे हुए हैं। दरअसल कहने को तो आदिवासी चार अक्षरों की छोटी-सी संज्ञा है, लेकिन यह शब्द देश भर में पैâली अनेक आदिवासी या वनवासी नस्लों, उनके सामाजिक संस्कारों, संस्कृति और सरोकारों से जुड़ा है। इनके जितने सामुदायिक समूह हैं, उतनी ही विविधतापूर्ण जीवन शैली और संस्कृति है।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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