मुख्यपृष्ठस्तंभसियासत का साधन नहीं हैं हनुमानजी!

सियासत का साधन नहीं हैं हनुमानजी!

कविता श्रीवास्तव।  हनुमानजी बहुत ही सरल और सहज उपलब्ध देवता हैं। मान्यता है कि वे आज भी जीवित-जागृत हैं। भक्तों पर वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं और सबका भला करते हैं। इसीलिए प्रत्येक सनातनी हिंदू धर्मानुयायी को हनुमान चालीसा कंठस्थ रहता है और वे अपनी सुविधानुसार इसका पाठ करते रहते हैं। इसके लिए किसी विशेष तैयारी, दिखावे या प्रयोजन की कोई आवश्यकता ही नहीं होती है। लेकिन आजकल हनुमान चालीसा पाठ को लेकर कुछ लोग चर्चा में हैं। वे दरअसल भगवान की प्रार्थना नहीं करना चाहते हैं। बल्कि वे तो हनुमान चालीसा के नाम पर अपनी राजनीति को चमकाने की इच्छा रखते हैं। वे भगवान के नाम पर सड़कों पर तमाशा करने की मंशा रखते हैं और इसका एलान करके राजनीतिक हलचल पैदा करने की फिराक में हैं। लेकिन वे शायद भूल रहे हैं कि हनुमानजी साधारण भगवान नहीं हैं। वे स्वयं शिव ही हैं।
हनुमान चालीसा की पंक्तियां हैं-
शंकर सुवन केसरी नंदन।
तेज प्रताप महा जग वंदन।।
अर्थात हे हनुमानजी, आप शंकर के अवतार हैं। हे केसरी नंदन आपके पराक्रम और महान यश की संसारभर में वंदना होती है।
लेकिन ध्यान रहे कि भगवान का पूजन उनकी मर्जी के बिना हो नहीं सकता। कहते हैं कि शिव के रुष्ट होने पर उनके रौद्र रूप का प्रभाव विनाश भी कर सकता है। क्योंकि सच्ची भक्ति के लिए स्वयं भगवान की अनुमति आवश्यक है। तभी तो प्रश्न उठता है कि भक्ति को कोई राजनेता अपनी मर्जी से इतना हल्का वैâसे बना सकता है?
हनुमान चालीसा में ही लिखा है-
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसा रे।।
अर्थात हे हनुमानजी, श्री रामचंद्र जी के द्वार के आप रखवाले हैं, जिसमें आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नहीं मिलता। अर्थात आपकी प्रसन्नता के बिना रामकृपा दुर्लभ है।
जब यही अर्थ है तो कोई भी व्यक्ति द्वेष का भाव लेकर हनुमान चालीसा का प्रयोग केवल अपनी राजनीतिक मंशा पूरी करने के लिए करेगा तो भगवान का नाराज होना स्वाभाविक है। आखिर भगवान स्वयं भी यह देखकर हैरान ही होंगे। फिर हनुमानजी तो आज भी जीवित हैं।
पौराणिक श्लोक है…..
अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:।।
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।
अर्थात- अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि वेदव्यास, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम व ऋषि मार्कण्डेय ये आठों अमर हैं। कहते हैं- भगवान विष्णु कल्कि रूप में जब अवतार लेंगे तब ये सभी देवता प्रकट हो जाएंगे।
अत: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हनुमानजी आज भी उपस्थित हैं। इसी कारण संसारभर के सनातनी लोगों में हनुमानजी के भक्तों की संख्या सर्वाधिक है। अमूमन प्रत्येक हिंदू धर्मानुयायी अपनी जेब में हनुमान चालीसा अवश्य रखता है। सब जानते हैं कि हनुमानजी के पिता सुमेरू पर्वत के वानरराज राजा केसरी थे और माता अंजनी थी। हनुमानजी को पवनपुत्र के नाम से भी जाना जाता है और उनके पिता वायुदेव भी माने जाते हैं। हम तो बचपन से हनुमानजी का पूजन करते आए हैं। हमारी माताजी की भी उनमें बहुत आस्था है। लेकिन वे कहती हैं कि महिलाएं हनुमानजी को छू नहीं सकतीं क्योंकि वे आजीवन ब्रह्मचारी रहे। इसीलिए महिलाओं को हनुमान जी की पूजा में उन्हें स्पर्श करना बिल्कुल मना है। संकटमोचन भगवान की पूजा में स्त्रियों के लिए खास नियम बनाए गए हैं। कहते हैं कि उनका पालन न करने से भगवान नाराज हो जाते हैं।
परंतु इधर मुंबई में एक ओर एक दल ने मस्जिदों के लाउडस्पीकर की ध्वनि रोकने के लिए दोगुनी ध्वनि से हनुमान चालीसा पढ़ने का राग अलापा ही था। इसी बीच एक राजनीतिक दंपति को न जाने कहां से हनुमान चालीसा के नाम पर स्वयं की राजनीति चमकाने की सूझी। इसके लिए उन्होंने जिस ठिकाने को चुना वहां पहुंचने कि मंशा से पहले ही उनके ही ठिकाने लग गए। राजद्रोह के आरोप में वे बंदी बना लिए गए हैं। हाल ये है कि अब इस दंपति की वर्तमान स्थिति पर पर हनुमान चालीसा की ये पंक्तियां सटीक बैठती हैं….
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूट ही बंदी महा सुख होई।।
श्रद्धालुओं का मानना है कि हनुमानजी को लेकर राजनीतिक चुहलबाजी करना, चटकारे लेना या किसी का मजाक उड़ाना शोभा नहीं देता। यह धृष्टता है। बहुत ओछी हरकत के अलावा कुछ नहीं। हम पूजा-पाठ अपने घर, अपने परिवार, अपने परिसर या मंदिरों में कर सकते हैं। किसी को चिढ़ाने, लज्जित करने या नीचा दिखाने के लिए किया गया कृत्य पूजा-पाठ वैâसे हो सकता है? समाज में दुर्भावना, द्वेष और बैर पैâलाने का कृत्य पूजा कहलाता है क्या? पंडितों का कहना है कि इस पर तो स्वयं भगवान ही सजा देंगे।
किसी शांत और संयमी स्वभाव के व्यक्ति को महज उकसाने के इरादे से हनुमान चालीसा पढ़ने की चेष्टा कहां तक उचित है? ऐसा करनेवालों पर भी हनुमान चालीसा की ये पंक्तियां सही हैं-
साधु संत के तुम रखवारे
असुर निकंदन राम दुलारे।।
अर्थ- हे श्री राम के दुलारे! आप सज्जनों की रक्षा करते हैं और दुष्टों का नाश करते हैं।
वैसे भी, हनुमान जी की पूजा में बहुत कुछ करने की जरूरत नहीं होती। लेकिन उनकी पूजा में महिलाओं के लिए कुछ नियम का पालन करना विशेष रूप से अनिवार्य माना गया है। महिलाएं कभी उनके चरण को नहीं छू सकतीं। हनुमान जी को कुछ भी अर्पित करते समय उनके सामने रखना चाहिए। हनुमानजी को महिलाएं चोला नहीं चढ़ा सकतीं। अगर आपने किसी रजस्वला महिला का स्पर्श किया है या उसके दिए सामान का इस्तेमाल किया है और आपने बिना वस्त्र बदले बजरंग बाण पाठ किया तो इससे हनुमान जी नाराज हो सकते हैं। क्योंकि वे ब्रह्मचारी हैं और स्त्री का साया उनकी पूजा के फल को कम कर सकता है।
हिंदुओं में हनुमान जी को जागृत देव माना गया है। कहा जाता है कि वे चिरंजीवी हैं। कलियुग में हनुमान जी की पूजा करने से सारे कष्‍ट दूर हो जाते हैं। प्रत्येक देवी-देवता की पूजा का अधिकार महिलाओं और पुरुषों को एक समान होता है। लेकिन हनुमान की पूजा आमतौर पर पुरुष ही करते हैं और महिलाएं मंदिर में प्रवेश तक नहीं करतीं। माना जाता है कि रामभक्‍त हनुमान स्त्रियों को माता स्‍वरूप मानते हैं, ऐसे में कोई महिला उनके चरणों के सामने झुके, वह उन्‍हें पसंद नहीं आता। हनुमानजी अखंड ब्रह्मचारी व महायोगी भी हैं। इसलिए आवश्यक है कि उनकी उपासना में वस्त्र से लेकर विचारों तक पावनता, ब्रह्मचर्य व इंद्रिय संयम को अपनाया जाए।
विद्वानों का कहना है कि हनुमान जी की पूजा में महिलाएं जनेऊ अर्पित न करें। अपने हाथों से सिंदूर न चढ़ाएं। बजरंग बाण का पाठ न करें। हनुमान जी को आसन न दें। चोला भी न चढ़ाएं। महिलाएं लंबे अनुष्ठान नहीं कर सकतीं। रजस्वला होने पर हनुमान जी से संबंधित कोई भी कार्य नहीं कर सकतीं। चरणपादुकाएं भी अर्पित न करें। पंचामृत स्नान नहीं कराना चाहिए। कपड़ों का जोड़ा समर्पित नहीं कर सकतीं। हालांकि महिलाएं धूप-दीप और पुष्प सब कुछ हनुमान के समक्ष चढ़ा सकती हैं। हनुमान चालीसा, संकट मोचन, हनुमानाष्टक, सुंदरकांड आदि का पाठ कर सकती हैं। हनुमान जी का भोग या प्रसाद अपने हाथों से बनाकर अर्पित कर सकती हैं। इन मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए हनुमानजी की भक्ति सभी करें। किसी कुचेष्टा के कृत्य से भगवान को परे रखें। इसके लिए सुमति से काम लेना चाहिए।
हनुमान चालीसा में भी कहा गया है-
महावीर विक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।।
अर्थ- हे महावीर बजरंग बली! आप विशेष पराक्रम वाले हैं। आप खराब बुद्धि को दूर करते हैं, और अच्छी बुद्धि वालों के साथी, सहायक हैं।

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