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बरसाने की होली!

कमलेश पांडेय `तरुण’
फोड़ि मटकी खाय माखन धाय हरसाने चले।
ले वैâ अबीर-गुलाल गिरधर लाल बरसाने चले।।
कूदत-फूदत लोटत-हंसत नाचत-गावत वैâ मनचले।
लै झुंड ग्वालन वैâ प्रभु राधा पे रंग डारन चले।।(१)
राधा रानी पिचकारी भरिवैâ तानि मारी श्याम को।
रंग डारी अपने रंग मा पूरी तरह घनश्याम को।।
छबि देखि ग्वाल गोपाल की राधा-राधा मनहि मुसकात हैं।
मन मुदित हो कहते `तरुण’ शोभा न बरनी जात है।।(२)
लाल-गुलाल लगाय वैâ गाल, गोपाल पे रंग उड़ावत राधा।
भइके आंचर काजर कंचुकि,
कान्हा रिझावत रीझत राधा।।
डारत हैं रंग प्रेम का प्रेम से,
राधा पे श्याम व श्याम पे राधा।
बंसी बजाय बजाय के धायके
नाचत श्याम नचावत राधा।।(३)
विरहिन की व्यथा!
दे वैâ कलेश गयो परदेश, न भेज्यो संदेश पठायो न पाती।
बीति गयो बरखा-बदरी, कथरी-गुदरी वाली शीतल राती।।
आयो न कंत बसंत गयो, न भयो दुख अंत न फाटत छाती।
पापी पपीहा पुकारे पिया, पर पापी पिया न पठावत पाती।।
नटखट ननदी!
ननदी कहै अड़बंगी पिया तोर,
भंग पी मौज उड़ावत होइहैं।
या तो पिया परदेशी तोरे, कउनों, सौतिन सेज सजवत होइहैं।।
बोली सखी सुधि आवत होई तो,
बैठि के आंसू बहावत होइहैं।।
धीर धर, न कर कछु हे गोरी तोर पिया घर आवत होइहैं।।
पिया मिलन!
होत ही प्रभात बात-बात में ही घात लगा,
दगा किया घोर चितचोर पिया धूर्त ने।
मल के गुलाल गोरे-गोरे गाल किया,
मन में उठा दिया हिलोर पिया धूर्त ने।।
तन, मन, बदन, जोबन सारा रंग दिया,
पी के भंग, जंग घनघोर किया धूर्त ने।
बड़ा बुरा हाल किया तनिक न खयाल किया,
जी-भर हलाल किया मोर पिया धूर्त ने।।
होली में बुढ़ऊ!
भंग के रंग में बूढ़ी उमंग में, संग में सुंदर नारी रहै तो।
गोरी रहै गदराई रहै अरु, नैनन तेज कटारी रहै तो।।
अलसानी रहे अनजानी रहे, मस्तानी जवानी कंवारी रहै तो।
फागुन मस्त बयार रहे अरु, हाथ मोरे पिचकारी रहै तो।।

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