मुख्यपृष्ठस्तंभमेहनतकश : कैटरिंग की नौकरी कर बच्चों को बनाया ग्रेज्युएट

मेहनतकश : कैटरिंग की नौकरी कर बच्चों को बनाया ग्रेज्युएट

आनंद श्रीवास्तव

वर्ष १९८० में बिहार की सरजमीं से नौकरी की तलाश में मुंबई आए प्रमोद चौरसिया को मंजिल पाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। किसी परिचित की पैरवी पर उन्हें सायन पंजाबी कॉलोनी के एक चर्चित ढाबा में नौकरी मिल गई। वहां बर्तन उठाने के काम से लेकर साफ-सफाई तक उन्हें करनी पड़ी। दिन भर मेहनत करके देर रात को उसी ढाबे में सो जाना, उसके बाद फिर से सुबह उठकर तैयारियों में जुट जाना यह उनका रोज का काम हो गया था। इसके बदले उन्हें कम सैलरी मिलती थी, लेकिन यहां रहकर उन्होंने अपना भविष्य शायद तलाश लिया था। इसलिए कम सैलरी में भी वह कड़ी मेहनत और लगन से अपना काम करते थे। यही वजह रही कि प्रमोद चौरसिया ने काम करते-करते धीरे-धीरे कुकिंग सीख ली।
कुछ ही दिनों के भीतर वह उक्त पंजाबी ढाबा के स्तर के कुक बन गए। उनके द्वारा बनाए गए लजीज खाने ग्राहकों की पसंद बन गए। जब प्रमोद चौरसिया कुकिंग में पूरी तरह से माहिर हो गए और उन्हें होटल लाइन की अच्छी -खासी जानकारी हो गई, तब उन्होंने इस ढाबे के मालिक से राय-मशविरा कर नौकरी छोड़ दी और खुद का वैâटरिंग व्यवसाय शुरू कर दिया। अक्षय पंजाब नामक उनके वैâटरिंग सर्विस के लिए उक्त ढाबा मालिक ने भी प्रमोद चौरसिया की मदद की। प्रमोद चौरसिया की जिंदगी में यह टर्निंग पॉइंट था इससे पहले उनका परिवार गांव में रहता था। लेकिन वैâटरिंग का व्यवसाय शुरू करते ही उन्होंने अपने परिवार को भी मुंबई बुला लिया।
कल्याण में रहते-रहते बच्चे पढ़ाई करने लगे। वैâटरिंग का खाना बनाने में प्रमोद की पत्नी उनकी मदद करतीं, कभी-कभी बच्चे भी हाथ बंटा देते थे। धीरे-धीरे प्रमोद चौरसिया का वैâटरिंग का व्यवसाय फलता-फूलता चला गया और आज कई हॉल, रिसॉर्ट और पार्टी हॉल के साथ उनका वैâटरिंग का मोनोपॉली कॉन्ट्रैक्ट है। वहीं दूसरी ओर उनके बच्चों ने भी ग्रेजुएशन पूरा कर लिया है। उनका बड़ा बेटा आज एक नामी बैंक में अच्छे पद पर कार्यरत है। प्रमोद चौरसिया कहते हैं कि मैंने जो मुसीबत झेली है वह मेरे बच्चे नहीं झेलें। इसके लिए मैंने उन्हें पढ़ाया-लिखाया। अब जाकर मेरी मेहनत रंग लाई है, ऐसा मुझे लगता है।

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