मुख्यपृष्ठस्तंभमेहनतकश: कड़ी मेहनत किस्मत बदल देती है

मेहनतकश: कड़ी मेहनत किस्मत बदल देती है

आनंद श्रीवास्तव

किसी ने सही कहा है कि कड़ी मेहनत व्यक्ति की किस्मत बदल देती है। कुर्ला के रत्नदीप नितिन कांबले के मामले में यह बात सौ फीसदी सच साबित हुई है। जिनकी पढ़ाई तो बहुत ज्यादा नहीं हुई लेकिन आज अपनी कमाई से संतुष्ट हैं। अक्सर लोग पढ़ाई-लिखाई पूरी करने के बाद ही घर की जिम्मेदारी संभालते हैं या फिर नौकरी-चाकरी करते हैं। लेकिन कुर्ला के रत्नदीप नितिन कांबले ऐसे शख्स हैं, जिन्हें उनकी परिस्थिति में स्कूल के दौरान खेलने-कूदने की उम्र में ही बिजनेसमैन बना दिया। जी हां, रत्नदीप कांबले आज एक मिनिरल वॉटर की एजेंसी चला रहे हैं और उनका यह व्यवसाय खूब फल-फूल रहा है। कुर्ला के स्टेट ट्रांसपोर्ट यानी एसटी डिपो में उनका पानी का स्टॉल है, जिससे रोजाना अच्छी-खासी कमाई हो जाती है।
इस कमाई से वे अपने माता-पिता की आर्थिक मदद कर रहे हैं। रत्नदीप बचपन से ही पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी भी करते रहे हैं। उन्होंने दसवीं तक की पढ़ाई की है। जब वे दसवीं में थे तब उनके पिता ने बोतल बंद पानी बेचने का काम उन्हें सिखा दिया था। इसके बाद से वे इसी में रम गए। उनके पिता नितिन कांबले की भी पढ़ाई किसी कारणवश ज्यादा नहीं हो सकी थी। उन्होंने भी एसएससी तक ही पढ़ाई की है। घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण नितिन कांबले दसवीं के बाद पेट्रोल पंप में नौकरी पर लग गए थे। पेट्रोल पंप के बाद वे बोतलबंद पानी और कोल्ड ड्रिंक के सप्लाई के काम से जुड़ गए। यहीं से उन्हें एक लाइन मिली, जिसे बाद में उनके बेटे रत्नदीप कांबले ने अपनी लगन और मेहनत से सीखा। रत्नदीप पढ़ाई के साथ-साथ अपने पिता के कोल्ड ड्रिंक और पानी की सप्लाई में मदद करते रहते थे। बाप-बेटे दोनों मिलकर काम करते थे और तब घर का गुजारा चलता था। धीरे-धीरे नितिन कांबले के बेटे रत्नदीप ने उनका सारा काम सीख लिया और जब कभी नितिन कहीं बाहर जाते, तो उनका बेटा ही सारा व्यवसाय संभाल लेता था।  इस तरह रत्नदीप के कंधे पर बचपन से ही जिम्मेदारी आ गई थी और वे उन जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते भी थे। आज नितिन कांबले बहुत खुश हैं कि उनका बेटा अपनी मेहनत और लगन से इतनी कम उम्र में व्यवसाय को आगे बढ़ा रहा है।
वे कहते हैं कि, `मेरे लिए इससे बढ़कर और क्या होगा। अगर वो कहीं नौकरी करता तो इस उम्र में शायद नौकरी भी नहीं मिलती और यदि मिल भी जाती तो उसे नौकरी के लिए दूर-दूर जाना प़ड़ता। यहां अपना व्यवसाय है। वह मन का राजा है। मैं चाहता हूं कि वह इसी तरह आगे ब़ढ़े।’ वे चाहते हैं कि रत्नदीप के बाद की पीढ़ी के बच्चे अच्छी तरह से पढ़ाई करें और आगे बढ़े। वहीं दूसरी ओर रत्नदीप का कहना है कि चाहे उन्हें दिन-रात मेहनत करनी पड़े लेकिन वह अपने माता-पिता को घर बिठाकर खिलाना चाहते हैं।

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