मुख्यपृष्ठनए समाचारमेहनतकश : जीवन में कभी हार नहीं मानी

मेहनतकश : जीवन में कभी हार नहीं मानी

आनंद श्रीवास्तव

अक्सर आपको नेत्र दिव्यांग व्यक्ति रेलवे स्टेशन पर लॉटरी की टिकट बेचते तो कभी बच्चों के खिलौने बेचते नजर आ जाएंगे या फिर ट्रेनों में गाना गाते या भीख मांगते नजर आ जाएंगे। लेकिन अब समय बदल गया है। नेत्र दिव्यांग लोग अपनी शिक्षा और काबिलियत के बलबूते निजी कंपनियों से लेकर सरकारी क्षेत्र में अपना परचम लहरा रहे हैं। कोई बड़ी कंपनी में कार्यरत है तो कोई बैंक में नौकरी कर रहा है। प्राइवेट फर्म हो या फिर मनपा का कोई विभाग, आपको नेत्र दिव्यांग हर जगह मिल जाएंगे। समय के साथ जीवन चक्र बदलता है। इन्हीं में से एक हैं सुभाष साल्वे। महाराष्ट्र के नासिक जिले के रहनेवाले सुभाष बचपन से नेत्र दिव्यांग हैं। उनकी पढ़ाई माटुंगा के माता लक्ष्मी स्कूल में हुई। उसके बाद उन्होंने सायन के एसआईईएस कॉलेज से एमए की पढ़ाई पूरी की। उसके बाद देवनार के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज से मास्टर इन सोशल वर्क किया, यानी समाजसेवा में मास्टर की डिग्री हासिल की। नेत्र दिव्यांग होने के कारण इन्हें नौकरी मिलने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद सुभाष ने हार नहीं मानी। सुभाष साल्वे के पिता प्रभाकर साल्वे बैंक में नौकरी पर थे, लेकिन अपने इस नेत्र दिव्यांग बेटे की नौकरी के लिए उन्होंने भी खूब मेहनत की। जिस इंस्टीट्यूट से सुभाष साल्वे ने पढ़ाई पूरी की उस इंस्टीट्यूट में वैकेंसी निकली थी, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिला। जब लाख कोशिश करने के बाद भी उन्हें नौकरी नहीं मिली तो वे थोड़ा हताश हो गए। सुभाष साल्वे ने कहा कि मैंने हिम्मत नहीं हारी, मैंने अपने जॉब की तलाश जारी रखी। आखिरकार, केईएम अस्पताल में एमएसडब्ल्यू की नौकरी मिल गई। १९९९ से अब तक लगभग २४ साल बीत चुके हैं। मैं अभी भी वहां जॉब कर रहा हूं। जॉब करते हुए मैंने उन सभी का मुंह बंद कर दिया जो कहते थे कि एक नेत्र दिव्यांग क्या कर सकता है? कैसे काम करेगा? मैं उन तमाम लोगों को यह संदेश देना चाहता हूं कि नेत्र दिव्यांग वह सारा काम कर सकता है, जो एक आम आदमी कर सकता है। आज तकनीकी में बदलाव आया है। टेक्नोलॉजी बहुत आगे बढ़ गई है। दिव्यांगों के लिए भी टेक्नोलॉजी बहुत फायदेमंद साबित हुई है। पहले नेत्र दिव्यांगों को फोन लगाने के लिए किसी पर आश्रित होना पड़ता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। यूपीआई से पैसों का ट्रांजेक्शन कर लेते हैं। एटीएम से ट्रांजेक्शन कर लेते हैं। इसी तरह रेलवे हो या फिर कोई और विभाग सभी जगह ब्रेललिपि में लिखे होने के कारण अपने-अपने प्लेटफॉर्म तक नेत्र दिव्यांग खुद पहुंच जाते हैं। किसी से पूछने की जरूरत नहीं पड़ती। यहां तक कि ईवीएम मशीन पर दिव्यांगों के लिए एक विशेष ब्रेललिपि का सिंबल बनाया जाता है, जिससे वोट किसे देना है, हमें पता चलता है। तो मेरा कहना यह है कि आज हम सभी क्षेत्र में लोगों की बराबरी में खड़े है। सुभाष साल्वे आज बड़ी सहजता से भले ही ये बातें कर रहे हो लेकिन उनका सफर इतना आसान नहीं था।

अन्य समाचार