मुख्यपृष्ठस्तंभमेहनतकश : लोगों के लिए अपना जीवन समर्पित करने का लिया संकल्प

मेहनतकश : लोगों के लिए अपना जीवन समर्पित करने का लिया संकल्प

अनिल मिश्र

बच्चों को शिक्षा देने के बाद सेंचुरी रेयान हाई स्कूल से सेवानिवृत्त होनेवाले वैâलाश पाल बच्चों को संस्कार व संस्कृति सिखाने में लगे हैं। इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के मड़ियाहूं तहसील के गनापुर (रामदेवा) गांव के निवासी वैâलाश पाल मुंबई स्थित कल्याण से लेकर अपनी जन्मभूमि उत्तर प्रदेश में ग्राम सुधार के लिए काफी प्रयासरत हैं।
वैâलाश पाल बताते हैं कि १९८१ में जौनपुर जिले के टी.डी. कॉलेज से एम.ए. की परीक्षा पास कर वो महाराष्ट्र प्रदेश के ठाणे जिले के उल्हासनगर शहर में आए। मुंबई से बीएड न होने के कारण उन्होंने सेवा सदन में प्रवेश लेना चाहा, परंतु उनका प्रवेश नहीं हो सका। अंतत: १९८३ में मुंबई स्थित परेल के गोखले एजुकेशन सोसायटी से उन्होंने बीएड किया। जून १९८४ में सेंचुरी रेयान स्कूल में वो सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्त किए गए। जब तक योग्य नौकरी नहीं मिली, तब तक घर में बैठने की बजाय वो किसी अन्य नौकरी की तलाश में लग गए। तीन जगहों पर उन्होंने सुरक्षा रक्षक के तौर पर नौकरी की। सुरक्षा रक्षक का काम नहीं जमने के कारण उन्होंने वो नौकरी छोड़ दी और उन्हें उस किए गए काम का वेतन भी नहीं मिला। बड़े भाई मालिक पाल के पास रहता था। वैâलाश पाल अपने बड़े भाई मालिक पाल जो सेंचुरी रेयान में काम करते थे, के पास जब तक नौकरी नहीं लगी तब तक उनके साथ रहे। बड़े भाई ने वैâलाश पाल को काफी सहारा दिया। वैâलाश पाल कहते हैं कि बड़े भाई को कोई संतान नहीं है इसलिए छोटे भाई के एक बच्चे की परवरिश कर उन्होंने उसे आई.टी. इंजीनियर तक की पढ़ाई करवाई। आज वो बच्चा नौकरी कर रहा है। बड़े भाई के साथ ही उन्होंने भी परिवार के बच्चों को पढ़ाई के साथ ही उनका योग्य मार्गदर्शन किया। एक शिक्षक होते हुए उन्होंने बच्चों को शिक्षा देने के साथ ही १९९३ में परमपूज्य संत आसाराम बापू से दीक्षा ली। आसाराम से दीक्षा लेने के बाद वे ऋषि प्रसाद में लग गए। समाज की सेवा ही सच्ची सेवा है। इसे ध्येय बनाने के साथ ही गुरु के आदेश पर वे घर-घर ऋषि प्रसाद बांट रहे हैं। ऋषि प्रसाद के मार्फत वैâलाश पाल जनसेवा कर संस्कृति व संस्कार को सुधारने का काम कर रहे हैं। पूनम के अवसर पर व्रतधारी बनकर वो गुरु जी से मिलने के लिए जाते हैं। तुलसी पूजन, मातृ-पितृ पूजन, गीता जयंती मनाने पर वे काफी जोर देते हैं। अपने गांव गनापुर में नाले पर काफी प्रायस करने के बाद उन्होंने पुलिया बनवाई। पुलिया के अभाव में मानसून के दौरान भारी बरसात के कारण बरसात का पानी भर जाने से इस पार से उस पार जाना लोगों के लिए असंभव सा हो जाता था। इसके साथ ही उन्होंने गांव में वृक्षारोपण भी किया है। जुलाई २०१८ में सेवानिवृत्त होने के बाद आगे का जीवन लोगों के जीवन के उद्धार के लिए अपना जीवन समर्पित करने का संकल्प उन्होंने लिया है।

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