मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनामेहनतकश: बेटे की बीमारी ने बनाया चायवाला

मेहनतकश: बेटे की बीमारी ने बनाया चायवाला

रवींद्र मिश्रा

इंसान चाहता कुछ है और होता कुछ और ही है इसीलिए कहते हैं न कि ‘आपन सोचा होत नहिं हरि सोचा तत्काल।’ यह कहावत दक्षिण भारत से आए पुरंदर करकेरा की जिंदगी में एकदम सटीक बैठती है।

दक्षिण भारत के उडिपी जिले के यूरियावारा गांव में पुरंदर करकेरा का परिवार खुशहाल जिंदगी जी रहा था। पिता के निधन के बाद पुरंदर करकेरा छोटे भाई, बहन, मां एवं पत्नी के साथ रह रहे थे। खैर, शादी के बाद पुरंदर की बहन ससुराल चली गई और छोटा भाई भी शादी के बाद अपना परिवार लेकर पुणे चला आया। अब घर में बच गए मां, पुरंदर और पुरंदर की पत्नी। परिश्रमी नौजवान पुरंदर रात के समय एक पैâक्टरी में वेल्डिंग का काम करते और दिन में रिक्शा चलाते थे। उनकी मेहनत से परिवार का गुजर-बसर अच्छे तरीके से हो रहा था। इसी बीच पुरंदर की पत्नी गर्भवती हो गई और डिलिवरी के लिए उसे उडिपी के मसीना अस्पताल में भर्ती करवाया गया। डिलिवरी नॉर्मल थी। लेकिन डिलिवरी के दौरान डॉक्टरों ने बच्चे के पैदा होने के दौरान क्लिप का प्रयोग किया। क्लिप का प्रयोग करने से बच्चे की बार्इं ओर की नस दब गई और बच्चा विकलांग हो गया। २००४ में पैदा हुए इस बच्चे का नाम परिवार वालों ने प्रथम रखा। आज प्रथम १९ वर्ष का हो गया है। मां-बाप ने उसके इलाज पर लाखों रुपए खर्च किए। लेकिन कहीं से भी आशा की कोई किरण परिवारवालों को अभी तक दिखाई नहीं दी। अब पुरंदर उडिपी छोड़कर मुंबई आ गए और दहिसर में एक भाड़े की दुकान लेकर उन्होंने चाय का धंधा शुरू कर दिया। उसी चाय की दुकान को चलाते हुए वे अपने बेटे प्रथम का इलाज करवा रहे हैं। अस्पताल से विकलांग का कार्ड बनवाने के लिए पुरंदर बेटे प्रथम को एंबुलेंस में लेकर उडिपी गए लेकिन अस्पताल कर्मियों की निष्क्रियता के चलते उन्हें बैरंग मुंबई वापस लौटना पड़ा। प्रथम को बिना एंबुलेंस के एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में बेहद परेशानी होती है। बिना एंबुलेंस के प्रथम कहीं आ-जा नहीं सकता। इसके बावजूद विकलांग कार्ड बनवाने के लिए पुरंदर को कहीं से कोई भी सरकारी सहायता नहीं मिल रही है। किराए का मकान, किराए की दुकान और सुबह ६ बजे से लेकर रात ११ बजे तक दिन भर चाय बेचकर अपने परिवार का गुजारा करने के साथ ही बेटे प्रथम के इलाज में बेहिसाब पैसा खर्च करनेवाले पुरंदर ने अभी हिम्मत नहीं हारी है। आज भी उन्हें विश्वास है कि एक दिन वो भी आएगा जब उनका बेटा प्रथम ठीक हो जाएगा। इस आस को मन में लिए परिवार सहित बेटे के लिए जी-जान से परिश्रम करनेवाले पुरंदर करकेरा के अथाह परिश्रम और पुरुषार्थ को लोग सलाम करते हैं।

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