मुख्यपृष्ठनए समाचारमेहनतकश : अनाथालय में बीता बचपन, अब बन गए एडवोकेट 

मेहनतकश : अनाथालय में बीता बचपन, अब बन गए एडवोकेट 

आनंद श्रीवास्तव

गोरख उबाले आज एडवोकेट गोरख उबाले बन गए हैं। एडवोकेट बनने तक का उनका यह सफर आसान नहीं था, जिसका अपना परिवार होता है, मां-बाप,भाई-बहन होते हैं वह कुछ न कुछ हाथ-पांव मार ही लेते हैं, लेकिन जिनका कोई नहीं है उसके लिए जीवन जीना कितना कठिन होता है यह गोरख उबाले जैसे लोग ही जानते हैं, उनका दिल ही जानता है। अपना बचपन अनाथालय में बिताने के बाद गोरख उबाले ने काफी मेहनत किया, जिंदगी में संघर्ष किया, अपनी पढ़ाई पूरी की और आज वह एडवोकेट के रूप में प्रैक्टिस भी करने लगे हैं।
अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए गोरख कहते हैं, `जब मैं साढ़े तीन साल का था तो मुझे पंढरपुर रिमांड होम में भर्ती कराया गया था। मुझे १८ साल की उम्र का होने तक विभिन्न रिमांड होम, संस्थानों और अनाथालयों में रखा गया। अठारह वर्ष के होने तक संस्थान में बहुत दुर्व्यवहार सहना पड़ा। १८ साल का होने पर मुझे संस्था से निकाल दिया गया। मैंने नौकरी करते हुए अपनी १२वीं साइंस की पढ़ाई पूरी की।’ गोरख उबाले बताते हैं कि रिमांड होम या अनाथालय से निकले हुए युवाओं को जल्दी कोई नौकरी नहीं देता है, मेरे साथ भी यही हुआ। वित्तीय स्थिति अच्छी नहीं थी, मैं जितना कर सकता था मैंने काम किया। हर तरह की नौकरी की। नौकरी करते हुए अपनी पढ़ाई को जारी रखा।’ आगे उन्होंने कहा कि मैं चिल्ड्रन एंड सोसाइटी में अपने साथ रहनेवाले बच्चों की यथासंभव सहायता करता था, बाद में सामाजिक न्याय विभाग के छात्रावास में रहकर सिद्धार्थ कॉलेज फोर्ट मुंबई से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। सामाजिक कार्य के प्रति जुनून होने के कारण, मैंने मास्टर ऑफ सोशल वर्क की डिग्री हासिल की है। फिलहाल, मैं कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहा हूं। मैं संस्था में अनाथ और बेसहारा बच्चों को कोर्ट के माध्यम से न्याय दिलाने के लिए काम कर रहा हूं।’
बीते दिनों को याद कर गोरख कहते हैं, `चार साल की उम्र से मैं रिमांड एडिक्शन का शिकार हूं। २००७ में, उन्होंने महाराष्ट्र राज्य के रिमांड होम, ऑडिशनल ऑब्जर्वेशन होम, चिल्ड्रेन रिफॉर्मेटरी, सेमी-गवर्नमेंटल इंस्टीट्यूशन, विभिन्न संस्थानों का दौरा किया। इसी तरह, उस संस्थान के १८ वर्ष पूरे कर चुके बच्चों के लिए और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए एक बैठक आयोजित की गई। विभिन्न समस्याओं को लेकर चेंबूर मुंबई में लड़के-लड़कियों की एक बैठक हुई और एक संस्था बनाने का प्रस्ताव पारित किया गया। मैंने अनाथों की समस्या को समाज के सामने रखने के लिए वृत्तचित्र बनाए और समाचार पत्रों को लेख दिए।
आज एडवोकेट गोरख उबाले को देखकर कोई नहीं कह सकता कि उनका बचपन कैसे बीता होगा? गोरख कहते हैं कि इस दुनिया में लोग आपका वर्तमान देखते हैं, भूतकाल नहीं। मेरे साथ भी यही हो रहा है और सभी के साथ ऐसा ही होता है।

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