मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनामेहनतकश: मुरली का सपना हुआ पूरा,बेटी को ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाया

मेहनतकश: मुरली का सपना हुआ पूरा,बेटी को ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाया

आनंद श्रीवास्तव
कहते हैं अगर किसी सपने को पूरा करना है तो जी-जान से उस सपने को पूरा करने में लग जाना चाहिए। कड़ी मेहनत और अच्छी किस्मत लोगों को उसके सपने पूरा करने में पूरी मदद करती है। कुछ ऐसा ही ४० साल पहले मुंबई आए मुरली पिल्ले के साथ हुआ। मुरली कभी सोच भी नहीं सकते थे कि एक दिन उनकी बेटी ऑस्ट्रेलिया में पढ़ने जाएगी और वहां वह अपने एमबीए की पढ़ाई पूरा करेगी। हालांकि, उनका यह सपना भी था। मुरली पिल्ले चाहते हैं कि उनकी इस होनहार बेटी श्रीलक्ष्मी को वहीं नौकरी मिल जाए। यह मुकाम हासिल करने में उन्हें काफी मेहनत करनी प़ड़ी। मुरली पिल्ले जब पहली बार मुंबई आए थे, तब वह एंटोपहिल में रहते थे। यहां उन्होंने नौकरी ढूंढ़ी। किसी तरह उन्हें नौकरी मिली, लेकिन वह उससे संतुष्ट नहीं थे। इसके बाद २ साल के लिए वे विदेश चले गए। वहां पर उन्होंने नौकरी की। फिर उनका मन नहीं लगा और वह वापस मुंबई लौट आए। इसके बाद उन्हें मुंबई के एक एक्सपोर्ट कंपनी में नौकरी मिल गई। इस सबके कारण वे बारहवीं से आगे की पढ़ाई नहीं कर पाए। शादी के बाद परिवार बढ़ता चला गया। मुरली पिल्ले नौकरी करते हुए अपनी बेटी को पढ़ाने लगे। उनकी दिली तमन्ना थी कि उनकी बेटी श्रीलक्ष्मी खूब आगे तक प़ढ़े। इसके लिए वे दिन-रात मेहनत करते थे। अपने क्षेत्र में वे खुद के पैसे से समाजसेवा भी करते रहते थे। इसी बीच एक्सपोर्ट की नौकरी करते-करते उन्होंने खुद का काम शुरू किया और आगे बढ़ते चले गए। दूसरी ओर उनकी बेटी ने आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जाने की विनती की। मुरली पिल्ले ने तुरंत बेटी की बात मान उन्हें ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में भेजा, जहां पर उनकी बेटी श्रीलक्ष्मी ने एमबीए की पढ़ाई पूरी की। वहां पर कई और भारतीय छात्र थे, जिनके साथ वह मिलकर पढ़ती थी। अपनी बेटी के सपने को पूरा करने की जिद थी मुरली में थी। आखिरकार वह पूरा हुआ। उन्हें आज तक इस बात द प्राउड फील होता है। कहते हैं कि मैं नहीं पढ़ सका तो क्या हुआ, मेरी बेटी मेरा सपना सच कर रही है।
मुरली पिल्ले चाहते हैं कि सभी बच्चे अपने मां-बाप का नाम रोशन करें। इसके लिए सभी को दिन-रात मेहनत करनी चाहिए। मुरली पिल्ले अपने पुराने दिन को कभी नहीं भूलते। उन्हें याद है कि किस तरह मुंबई में आने के बाद उन्होंने दिन-रात मेहनत की। पहले किराए का घर था, लेकिन आज अपना खुद का घर है। यह घर बनाने के लिए उन्हें २०-२० घंटे तक काम करना पड़ा, लेकिन काम करने में वे कभी पीछे नहीं हटे। अब मुरली पिल्ले अपनी जिंदगी में मुकाम हासिल कर चुके हैं, इसलिए बचा हुआ टाइम निस्वार्थ भावना से समाजसेवा में लगाते रहते हैं। लोगों की हर तरह से मदद करते हैं। मुरली पिल्ले आज भी मेहनत करते हैं। उनकी प्राथमिकता परिवार के साथ-साथ उनसे जुड़े लोग भी हैं। अब उनका कारोबार बढ़ चुका है और नौकरी करनेवाले मुरली पिल्ले आज लोगों को नौकरी दे रहे हैं।
(यदि आप भी मेहनतकश हैं और अपने जीवन के संघर्ष को एक उपलब्धि मानते हैं तो हमें लिख भेजें या व्हाट्सऐप करें।)

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