मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनामेहनतकश: मुश्किलों के बावजूद हिम्मत नहीं हारे

मेहनतकश: मुश्किलों के बावजूद हिम्मत नहीं हारे

अनिल मिश्र

ईमानदारी को महत्व देनेवाले हंसमुख और व्यक्तित्व के धनी अनुपम पांडेय के अधिवक्ता पिता उमाकांत पांडे छोटी उम्र में ही मुंबई आ गए थे। मुंबई आने के बाद सेंचुरी रेयान धागा कंपनी में काम करते हुए उमाकांत पांडे ने अपना अस्तित्व बनाया। अनुपम पांडे कहते हैं कि पिता द्वारा परिवार के प्रति किया गया समर्पण और उनके द्वारा बताए गए सत्मार्ग पर चलकर ही आज वे निरंतर विकास की राह पर अग्रसर हैं। आज जहां एक-एक कर फ्लोर मील (चक्की) बंद हो रही हैं, वहीं उसी चक्की को आजीविका का साधन बनाते हुए अनुपम पांडे ने उसे उद्योग का रूप दे दिया है। एक चक्की के बाद तीन और चक्की लगानेवाले अनुपम पांडे प्रतियोगिता के इस कठिन दौर में मध्य प्रदेश और पंजाब से अनाज मंगाकर उल्हासनगर जैसे प्रतियोगी शहर में मजबूती के साथ खड़े हैं। आज अनुपम पांडे के लिए चक्की ही उनकी आजीविका का मूल साधन बन गई है।

उल्हासनगर वैंâप नंबर-३ के शास्त्री नगर स्थित एक झोपड़ी में पिता के साथ रहनेवाले अनुपम पांडे बताते हैं कि उनका जन्म उल्हासनगर में ही हुआ। श्री गुरु गोविंद सिंह हिंदी हाई स्कूल से दसवीं तक पढ़ाई करने के बाद कल्याण के जोशी बाग जूनियर कॉलेज से उन्होंने १२वीं की पढ़ाई की। अपने आदर्शवादी पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए अनुपम पांडे उनकी तरह ही सादगी भरा जीवन बिताते हुए उनके बताए मार्ग पर आज भी चल रहे हैं। इतना ही नहीं, पिता द्वारा खोले गए शास्त्री विद्यालय के संचालन में भी उन्होंने पिता की काफी मदद की। लेकिन कानूनी अड़चनों और आर्थिक तंगी के कारण विद्यालय काफी दिनों तक नहीं चल पाया। तीन वर्षों के उपरांत जब स्कूल बंद हो गया तो अनुपम पांडे ने मर्चेंट नेवी में नौकरी पाने के लिए आईटीआई अंबरनाथ से ट्रेनिंग की। लेकिन बाद में शिपिंग बोर्ड ने पूरे आईटीआई को ही अमान्य कर दिया। इतना सब हो जाने के बाद भी अनुपम पांडे हिम्मत नहीं हारे और पिता द्वारा खोली गई चक्की को वे चलाने लगे। आज चक्की के मालिक बनने के साथ ही वे अनाज के होलसेल व्यापारी बन गए हैं। उल्हासनगर में अपना व्यापार करनेवाले अनुपम पांडेय आज अंबरनाथ में अपने खुद के फ्लैट में रहते हैं। तीन भाइयों और एक बहन में सबसे छोटे अनुपम पांडे जीवन के आए अनेक उतार-चढ़ाव से दो-दो हाथ करते हुए अपने पिता के सिद्धांतों और आदर्शों पर चलकर आज निरंतर विकास के पथ पर अग्रसर हैं। अनुपम पांडे कहते हैं कि उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर हर मोड़ पर उनका साथ देनेवाली उनकी पत्नी का उनके जीवन के संघर्षो में अहम योगदान है। अनुपम पांडेय बताते हैं कि दो बच्चों में से उनका बड़ा लड़का साइंस से १२वीं करने के बाद आगे की पढ़ाई कर रहा है और बेटी नौवीं कक्षा में पढ़ रही है। अनुपम पांडे चाहते हैं कि उनका बेटा पढ़ाई कर इंजीनियर बने और बेटी राजनीति शास्त्र की पढ़ाई कर राजनीति में नाम कर परिवार का नाम भी रोशन करे।

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