मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनामेहनतकश : दिव्यांगता को मात देकर जीती जीवन की जंग

मेहनतकश : दिव्यांगता को मात देकर जीती जीवन की जंग

अशोक तिवारी

किसी भी व्यक्ति के लिए दिव्यांग होना अभिशाप की तरह है। अपने अथक प्रयासों के बाद सरकार ने कुछ वर्षों से पोलियो जैसी बीमारी पर लगाम जरूर कस दी है लेकिन देश में लाखों लोग शारीरिक दिव्यांगता से जूझ रहे हैं। शारीरिक रूप से दिव्यांगों का जीवन काफी कष्टप्रद हो जाता है और रोजी-रोटी की समस्या को सुलझाने के लिए उन्हें काफी जद्दोजहद का सामना करना पड़ता है। अधिकतर दिव्यांग अपनी शारीरिक दुर्बलता को कुदरत की इच्छा मानकर संतोष कर लेते हैं और जैसे-तैसे जीवनयापन करते हुए अपना जीवन काट लेते हैं। लेकिन इन्हीं दिव्यांगों के बीच नन्हेंलाल देवनारायण यादव एक ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने अपनी शारीरिक दिव्यांगता को मात देते हुए कामयाबी हासिल की और २४ वर्षों से घाटकोपर में पान बेचकर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं।
नन्हेंलाल यादव बताते हैं कि उनका जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के कुंडा तहसील के अंतर्गत आनेवाले पिंग गांव में हुआ था। नन्हेंलाल यादव के पिता देवनारायण यादव किसान थे। प्रतापगढ़ के कुंडा क्षेत्र से ही १२वीं तक पढ़नेवाले नन्हेंलाल को जन्म के करीब ४ वर्षों बाद पोलियो हो जाने से उनका बायां पैर खराब हो गया। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार नन्हेंलाल यादव को ६४ प्रतिशत दिव्यांगता है। सन् २००० में रोजी-रोटी की तलाश में नन्हेंलाल यादव प्रतापगढ़ से मुंबई आ गए। मुंबई आने के बाद नन्हेंलाल यादव ने भिवंडी में एक कंपनी में बतौर मजदूर काम शुरू किया। लेकिन शारीरिक दिव्यांगता के चलते इस कार्य को करने में असफल रहे और कुछ ही महीनों में उन्होंने हार मान ली। परिवारवालों की इच्छा थी कि नन्हेंलाल गांव वापस आ जाएं, लेकिन उन्होंने हिम्मत न हारते हुए कुछ कर गुजरने की ठानी और घाटकोपर (पूर्व) स्थित पंतनगर में भानुशाली वाड़ी के सामने एक पान की दुकान खोल दी। पिछले २४ सालों से नन्हेंलाल यादव भानुशाली वाड़ी के सामने फुटपाथ पर पान का धंधा कर रहे हैं। नन्हेंलाल यादव बताते हैं वो सुबह ९ बजे दुकान पर आ जाते हैं और रात ११ बजे दुकान बंद करते हैं। विवाहोपरांत दो बेटियों और एक बेटे के पिता बने नन्हेंलाल यादव के तीनों बच्चे अभी पढ़ाई कर रहे हैं। पान की दुकान से कमाई कर अपने परिवार का भरण-पोषण करनेवाले नन्हेंलाल यादव ने गांव में एक आलीशान मकान बनवाया, जिसे देखने के बाद गांव वाले आश्चर्यचकित रह गए। घाटकोपर (पूर्व) के पंतनगर में आज भी किराए के मकान में रहनेवाले नन्हेंलाल का दावा है कि बहुत जल्द ही वे अपना खुद का घर भी खरीद लेंगे। नन्हेंलाल यादव का मानना है कि जिंदगी में कुछ कर गुजरने की तमन्ना हो तो शारीरिक दिव्यांगता भले ही आड़े आए लेकिन वो इंसान को सफल होने से नहीं रोक सकती। नन्हेंलाल चाहते हैं कि उनके तीनों बच्चे उच्च शिक्षित होकर जिंदगी में एक कामयाब इंसान बनें। फिलहाल, नन्हेंलाल यादव का जीवन उन दिव्यांगों के लिए प्रेरणादायी है, जिन्हें लगता है कि शारीरिक दिव्यांगता की वजह से वो जिंदगी में कुछ करने लायक नहीं रह गए हैं। खैर, नन्हेंलाल यादव चाहते हैं कि सरकार दिव्यांगों के लिए कोई कल्याणकारी योजना बनाए और उनके पुनर्वसन और रोजी-रोटी की समस्या को हल करने के लिए कारगर दिशा में नीति तय करे।

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