मुख्यपृष्ठसमाज-संस्कृतिमेहनतकश : प्राइवेट नौकरी कर बेटों को दिलाई कामयाबी

मेहनतकश : प्राइवेट नौकरी कर बेटों को दिलाई कामयाबी

बरसों तक प्राइवेट कंपनी में जी-तोड़ मेहनत करनेवाले दिनेश तिवारी ने अंतत: अपने एक बेटे को इंजीनियर, दूसरे को मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव और तीसरे बेटे को गांव का प्रधान बना ही दिया। अपनी इस कामयाबी का श्रेय दिनेश तिवारी अपने माता-पिता सहित अपने गांव की कुलदेवी सती माता को देते हैं। गौरतलब है कि दिनेश तिवारी के पिता दयाशंकर तिवारी टाटा कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड के पद पर कार्यरत थे। अपने जीवन के ४० वर्ष टाटा कंपनी को देनेवाले दयाशंकर तिवारी ने रिटायरमेंट के बाद अपनी जगह अपने इकलौते बेटे दिनेश तिवारी को काम पर लगवा दिया। बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि वाले दिनेश तिवारी ने उत्तर प्रदेश के पट्टी क्षेत्र से बी.ए. की पढ़ाई की। धीरे-धीरे उन्होंने टाटा कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों का विश्वास हासिल कर लिया। इसके बाद कंपनी ने उन्हें पदोन्नति देकर क्लर्क बना दिया। विवाहोपरांत दिनेश तिवारी तीन बेटों के पिता बने लेकिन बेटी की कमी उन्हें हमेशा महसूस होती रही। बेटियों के प्रति दिनेश तिवारी के प्रेम को इस तरह देखा जा सकता है कि उनके गांव सर्वेमऊ में होनेवाली हर बेटी की शादी में दिनेश तिवारी बढ़-चढ़कर योगदान करते हैं। इसके अलावा कई गरीब बेटियों का विवाह उन्होंने अपने निजी खर्चे से कराई है। दिनेश तिवारी का बड़ा बेटा रोशन तिवारी पढ़-लिखकर नागपुर शहर में आईटी इंजीनियर है और उनका दूसरा बेटा पवन तिवारी मेडिकल की पढ़ाई करने के बाद एक प्रतिष्ठित कंपनी में एमआर के पद पर कार्य कर रहा है। बचपन से ही सामाजिक कार्यों में गहरी दिलचस्पी होने के कारण उन्होंने जौनपुर जिले के मछलीशहर तहसील के अंतर्गत अपने पैतृक गांव सर्वेमऊ में जनहित कार्यों को करना आरंभ किया। इन कार्यों के चलते दिनेश तिवारी की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि वर्ष २०२१ के आम चुनाव में गांव के लोगों ने उनकी पत्नी को भारी मतों से जिताकर प्रधान बना दिया। लेकिन इसी दौरान दिनेश तिवारी के जीवन में बहुत बड़ी विपत्ति आ गई। चुनाव के नतीजे आने से पहले ही उनकी पत्नी का देहांत हो गया। अभी पत्नी के देहांत को दो दिन ही हुए थे कि उनकी बड़ी बहू भी स्वर्ग सिधार गई। परिवार पर अचानक आए इस दुख के पहाड़ को देख गांव वालों ने उन्हें भरपूर सहयोग किया। खैर, कुछ दिनों बाद सर्वेमऊ गांव में प्रधान के लिए फिर चुनाव हुआ। इस चुनाव में गांव के लोगों ने उनकी दूसरी बहू रोशनी तिवारी को भारी मतों से विजयी बना दिया। पत्नी के जाने के बाद दिनेश तिवारी ने टाटा कंपनी से इस्तीफा दे दिया और ज्यादातर गांव में रहकर गांव वालों की समस्याओं को सुलझाने लगे। दिनेश तिवारी का मानना है कि मेहनत करने से इंसान अपने जीवन में मजबूती प्राप्त करता है। जिंदगी में आनेवाली समस्या को सफलतापूर्वक निपटाकर जीवन में आगे बढ़ सकता है।

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