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मेहनतकश : बेरोजगारों को दे रहे रोजगार

अनिल मिश्रा

कहते हैं मेहनत करनेवालों की कभी हार नहीं होती। इस कहावत को सामने रखकर १९८६ में उत्तर प्रदेश के जिला जौनपुर के मडियाहूं के तीवरान के नर्वदेश्वर चिंतामणि तिवारी १२वीं तक की पढ़ाई कर मुंबई आए। उसके बाद घाटकोपर के झुनझुनवाला कॉलेज से स्नातक बने। उल्हासनगर के चंदीबाई, देवनार, मुंबई विद्यापीठ से कोर्स कर पापुलेशन रिसर्च, टाटा इंस्टिट्यूट में काम करने लगे। इस पढ़ाई के दौरान उन्होंने टीसी की रेलवे परीक्षा दी और पास हो गए। लेकिन वे अपना खुद का कोई रोजगार करना चाहते थे। पहले उन्होंने कोर कंप्यूटर प्रशिक्षण का कार्य शुरू किया। उन्होंने बताया कि उसके बाद सीएमएस उल्हासनगर की शाखा को चलाया। तकरीबन १८ वर्ष में सैक़ड़ों बच्चों को कंप्यूटर का प्रशिक्षण देकर उन्हें प्रशिक्षित किया। उसके बाद ग्रहदशा कुछ खराब हो गई। मालिक से नौकर बना। उन्होंने टेली चेम्स कंपनी में काम किया।
आज वे भारत सरकार की रोजगार देनेवाली कंपनी में मैनेजर हैं। इस योजना के माध्यम से बेरोजगार बच्चों को प्रशिक्षण देकर रोजगार बनाने का कार्य चल रहा है। बता दें कि उल्हासनगर में रोटरी क्लब, रोटेक्ट क्लब का अध्यक्ष बनकर गरीब लोगों को पानी, शिक्षा बढ़ाने जैसे कार्य कर चुके हैं।
तिवारी बताते हैं कि उनका जीवन काफी संघर्ष भरा रहा। उन्हें दो बेटियां हैं। छोटी बेटी नारायणा विद्यालय, कल्याण में पढ़ रही है। उसकी इंजीनियर बनने की इच्छा है। बड़ी बेटी नौकरी करते हुए एमबीए की परीक्षा की तैयारी कर रही है। तिवारी को खुशी इस बात की है कि उन्होंने सैक़ड़ों लोगों को रोजगार दिया है। वे आज कंप्यूटर इंजीनियर बनकर अच्छी तरह से परिवार की परवरिश करते हुए खुश हैं। आगे भी उनकी मंशा है कि वे दुर्गम स्थल में जाकर बेरोजगार लोगों को प्रशिक्षण देकर उन्हें रोजगार दें। नर्वदेश्वर तिवारी का कहना है कि हर व्यक्ति को समाज के लिए कुछ करना चाहिए। उसी दिशा में वे काम कर रहे हैं। तिवारी की मानना है कि अच्छा कार्य करनेवाला परेशान जरूर होता है, पर समाप्त नहीं होता। इस संघर्षमय जीवन में उनकी पत्नी ज्योति ने भी उन्हें सहयोग दिया। समाज कार्य समझकर लोगों को योग मार्गदर्शन कर रहे हैं। योगा क्लास में भी जाकर वे योग सिखाने का कार्य करते हैं। तिवारी कहते हैं कि उनके इस कार्य से प्रभावित होकर लोग जब सर कहते तो उन्हें गर्व महसूस होता है।

 

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