मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनामेहनतकश : जीना इसी का नाम है...

मेहनतकश : जीना इसी का नाम है…

आनंद श्रीवास्तव
`किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार…’ राज कपूर का यह गाना तो आप सभी ने सुना ही होगा। यह गाना हमें सिखाता है कि जिंदगी में कितनी भी तकलीफें क्यों न आ जाएं, हमें कभी हार नहीं माननी चाहिए और न ही थककर बैठ जाना चाहिए। महज १३ वर्ष की उम्र में रेल दुर्घटना में अपना एक हाथ गवां चुके मयूर डुमासिया भी आज एक मिसाल बन चुके हैं। अपनी जिंदगी में आई इतनी बड़ी परेशानी के बाद वे मायूस नहीं हुए, बल्कि आज वे दक्षिण मुंबई स्थित के. सी. कॉलेज में प्रोफेसर हैं। ६९ मैराथन दौड़ चुके है, दिव्यांग क्रिकेट के राष्ट्रीय टीम के प्लेयर के रूप में  अंतर्राष्ट्रीय मैच खेल चुके हैं। आज वे इतने बड़े हादसे से उबरने के बाद मयूर ने सफल होकर लोगों के सामने एक मिसाल कायम की है और उन्होंने यह बताया कि जीवन में कुछ भी हो जाए हमेशा आगे बढ़ते रहना चाहिए, रुकना या थमना नहीं चाहिए।
गौरतलब है कि मयुर सफलता की बुलंदियों को हासिल कर उन तमाम लोगों के लिए मिसाल बन गए हैं, जो छोटी-छोटी बातों पर निराश हो जाते हैं। मयूर ने सिखा दिया है कि जिंदगी कैसे जीनी चाहिए। जबकि रेल हादसे के बाद वह खुद भी निराश हो चुके थे लेकिन संभले और खुद को एक ऐसे मुकाम पर पहुंचाया। बता दें कि जब वह १० साल के थे तब उनकी मां चल बसी थीं। नन्हीं-सी उम्र में ही सिर से मां का साया हटने के गम से वह उबर भी नहीं पाए थे कि ३ साल के बाद खुद मस्जिद बंदर स्टेशन पर वे लोकल ट्रेन की चपेट में आ गए। इस दुर्घटना में उनका एक हाथ कट गया और वह दिव्यांग बन गए। इसके बाद कई दिनों तक मयूर डुमासिया डिप्रेशन के शिकार रहे, खुद को खत्म करने की कोशिश की। तब डॉक्टरों ने उनकी काउंसलिंग की और उनके परिवार वालों ने उनका हौसला बढ़ाया। ऐसे में मयूर को मन में लगने लगा कि मैं यह क्या कर रहा था, मैं न खुद पर और न किसी और पर बोझ बनूंगा, बल्कि अपनी जिंदगी की कहानी खुद लिखूंगा। इसके बाद मयूर डुमासिया ने पढ़ाई जारी रखी और एम ए पास किया। साथ ही वह स्पोर्ट्स में आगे बढ़ते चले गए। दिव्यांग क्रिकेट टीम के प्लेयर के रूप में वह अच्छा प्रदर्शन करने लगे, यह देख उन्हें जल्द ही राष्ट्रीय टीम में मौका मिल गया। भारतीय दिव्यांग क्रिकेट टीम में खेलकर मयूर का देश के लिए कुछ करने का सपना भी पूरा हो गया। लेकिन उन्होंने जिनके सामने देश सेवा का प्रण लिया था, वह उनके रोल मॉडेल यानी उनके पिता भी कुछ वर्ष पहले ही चल बसे थे। बस आसमान की ओर देखकर मयूर ने इस उपलब्धि पर अपने पिता का आशीर्वाद लिया। मयूर कहते हैं कि दिव्यांग होने के बावजूद मैंने अपना सब सपना पूरा किया। टीवी में हमेशा मैराथन दौड़ देखता था तब मैं खुद भी इस दौड़ में हिस्सा लेने के बारे में सोचता था। एक दिन मैंने मुंबई मैराथन में हिस्सा लिया, उसके बाद वसई-विरार मैराथन में दौड़ा। इसके बाद से तो यह सिलसिला ही चल पड़ा। आज वह ६९ बार मैराथन में हिस्सा ले चुके हैं। इसके बाद उनका अगला लक्ष्य लद्दाख से कन्याकुमारी तक साइकिल चलाने का है। एक हाथ से साइकिलिंग का विश्व रिकॉर्ड वह बना ही चुके हैं, अब उनका इरादा लद्दाख से कन्याकुमारी तक साइकिलिंग का अनोखा रिकॉर्ड बनाना है।

अन्य समाचार