मुख्यपृष्ठनए समाचारमेहनतकश : चाय बेचकर बेटे को बनाया डॉक्टर 

मेहनतकश : चाय बेचकर बेटे को बनाया डॉक्टर 

आनंद श्रीवास्तव

प्रभादेवी में चाय की दुकान चला रहे जटाशंकर यादव आज बहुत खुश हैं। उन्हें ख़ुशी इस बात की है कि रोज कमाने खाने की जद्दोजहद में वे ज्यादा पढ़ तो नहीं पाए, लेकिन अपने एक बेटे को डॉक्टर और दूसरे बेटे को आईटी इंजीनियर बनाने में सफल रहे हैं। आज उनके दोनों बेटे अपने पैरों पर खड़े हैं। इससे ज्यादा उन्हें और कुछ नहीं चाहिए। आज जिस मुकाम पर जटाशंकर के बेटे पहुंचे हैं उसके लिए उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ी है। अपने गुजरे जमाने को याद कर जटाशंकर बताते हैं कि वे मुंबई में तीन पीढ़ी से रह रहे हैं। सबसे पहले उनके पिता राजाराम यादव वर्ष १९२६ में उत्तर प्रदेश के मड़ियाहू से मुंबई आकर बसे थे। रोजगार की तलाश में वे मुंबई के कुर्ला बैल बाजार इलाके में आकर बस गए। यहां पर वे एक तबेले में दूध बांटने का काम करते थे, उसके बाद धीरे-धीरे खुद का व्यवसाय शुरू कर दिया। जटाशंकर यादव कहते हैं कि मेरे पिता दिन-रात मेहनत करते थे। इसके बाद उन्होंने दक्षिण मुंबई के कालबादेवी में दूध की दूकान खरीद ली। यहां उनका व्यवसाय चल पड़ा और उन्होंने एक के बाद एक करके ३ दुकानें बना लीं। इसमें जटाशंकर के चाचा ने भी समान रूप से हाथ बंटाया था। उसी दौरान जटाशंकर यादव के पिता ने एक दुकान प्रभादेवी में भी शुरू की, जिसे आज जटाशंकर खुद संभाल रहे हैं। धंधा-व्यवसाय को बढ़ाने में अपने पिता का हाथ बंटाते-बंटाते जटाशंकर यादव को पढ़ने का अवसर ही नहीं मिल पाया और नौंवी कक्षा की पढ़ाई से उन्हें संतुष्ट होना प़ड़ा। लेकिन जटाशंकर यादव ने पैâसला किया कि भले ही वे न पढ़ पाए हों, लेकिन अपने बच्चों की पढ़ाई में रूकावट नहीं आने देंगे और उन्होंने यह करके भी दिखाया। जटाशंकर यादव ने अपने बड़े बेटे ओमप्रकाश यादव को पढ़ा-लिखा कर डॉक्टर बनाया। आज उनके बेटे ओमप्रकाश यादव परेल के मनपा विभाग में बतौर सरकारी डॉक्टर कार्यरत हैं। जटाशंकर की बड़ी बहू सुमन ने भी डॉक्टरी की पढ़ाई की है। वहीं जटाशंकर यादव दूसरे बेटे जयप्रकाश ने आईटी इंजानियरिंग की पढ़ाई पूरी कर ली और अब वे आईटी सेक्टर में कार्यरत हैं। जटाशंकर यादव को इस बात की खुशी है कि वे खुद तो ज्यादा पढ़ नहीं पाए लेकिन उनके बच्चे पढ़-लिख कर आज अपने पैरों पर खड़े हैं। अपने बच्चों पर वे अपनी दुकान का व्यवसाय थोपना नहीं चाहते थे, उन्होंने बच्चों को अपना भविष्य बनाने की छूट दे दी थी, सो उनके बच्चों ने भी मान-सम्मान रखा और आज वे एक मुकाम पर पहुंच गए हैं, जिसे देखकर जटाशंकर यादव बेहद खुश हैं।

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