मुख्यपृष्ठनए समाचारमेहनतकश : कभी हार नहीं मानूंगा

मेहनतकश : कभी हार नहीं मानूंगा

आनंद श्रीवास्तव

नगर के राशिल गांव से नौकरी के लिए मुंबई आए विशाल पुणेकर आज बेस्ट में बतौर ड्राइवर की नौकरी कर रहे हैं। मैकेनिकल डिप्लोमा करके भी विशाल पुणेकर को कहीं नौकरी नहीं मिली। विशाल के पिता गांव में खेती करते हैं। उन्होंने पाई-पाई इकट्ठा करके अपने बेटे को पढ़ाया, ग्रेजुएट बनाया। उसके बाद किसी की सलाह पर उनके बेटे विशाल ने नगर के सिद्धिविनायक पॉलिटेक्निक इंस्टीट्यूट से मैकेनिकल डिप्लोमा पूरा किया। इसके लिए काफी खर्च आया, जो परिवार ने यहां-वहां से कर्ज लेकर पूरा किया। विशाल और उनके परिवार को पूरी उम्मीद थी कि उसे डिप्लोमा करने के बाद अच्छी नौकरी मिल जाएगी और उससे मिलनेवाली मोटी तनख्वाह से सारा कर्ज चुका देंगे। लेकिन उनकी इस उम्मीद पर पानी फिर गया। विशाल को कहीं नौकरी नहीं मिली। यदि मिलती भी तो मात्र दस हजार रुपए प्रति माह तनख्वाह के आस-पास की, वो भी ट्रेनी के तौर पर। मुंबई में भटकने के बाद नौकरी न मिलता देख विशाल ने वापस अपने गांव नगर लौटकर पिता के साथ खेती-बाड़ी के काम में हाथ बंटाने का पैâसला कर लिया था। इसी बीच बेस्ट में बस ड्राइवर और कंडक्टर की नौकरी के लिए इंटरव्यू शुरू है, ऐसी जानकारी किसी ने विशाल पुणेकर को दी। वह तुरंत इंटरव्यू के लिए पहुंच गए। उन्हें गाड़ी चलानी आती थी, साथ ही उनके पास हैवी लाइसेंस था, इसलिए विशाल को बेस्ट में ड्राइवर की नौकरी मिल गई।
बता दें कि जब विशाल नौकरी के लिए मुंबई आए थे तब उनके पास रहने का ठिकाना नहीं था। ऐसे में उनके एक रिश्तेदार ने उन्हें सहारा दिया था। अपने उस रिश्तेदार को धन्यवाद देते हुए विशाल कहते हैं कि मेरे स्ट्रगल के दौर में जिन लोगों ने मेरी मदद की उन्हें कभी नहीं भूलूंगा।
विशाल कहते हैं कि मैकेनिकल डिप्लोमा करके ट्रेनी की नौकरी मिली वह भी दस हजार रुपए प्रति महीना, जबकि बेस्ट में ड्राइवर की नौकरी के साढ़े उन्नीस हजार रुपए प्रति माह सैलरी मिल रही है तो इसमें बुरा क्या है? मेरे घर का किराया और अन्य खर्च निकालकर बचे पैसे से अपना कर्ज चुकाऊंगा, यही सोचकर विशाल ने बेस्ट की नौकरी ज्वॉइन कर ली। अब वह इसी में खुश है। हां, कुछ दिन पहले हुई स्ट्राइक से वह परेशान जरूर हुए थे, लेकिन अब वह खुश हैं क्योंकि सब कुछ सही चल रहा है। जल्द ही विशाल मुंबई में खुद का घर खरीदने का भी सोच रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि एक-दो साल में उनका यह सपना भी पूरा हो जाएगा। उनका कहना है कि जिंदगी में वैâसी भी परिस्थिति क्यों न आए हमें हार कभी नहीं मानना चाहिए।

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