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`कछुआ मित्र’ नहीं ये तो मसीहा हैं! … मछुआरे कर रहे हैं कछुओं का संरक्षण

मनमोहन सिंह 
कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन से अगर किसी को फायदा हुआ है तो वह हैं कछुए। ऑलिव रिडले नाम के दुर्लभ प्रजाति के कछुओं की पैदाइशी आंकड़ों को देखते हुए यह खुश होनेवाली बात है, ऐसा कहना है मोहन उपाध्याय का। `कछुआ मित्र’ नाम से प्रसिद्ध मोहन उपाध्याय तकरीबन पिछले दो दशक में कछुओं की इस विशेष प्रजाति के सरंक्षण के लिए लगे हुए हैं।
दरअसल, उनका कहना है कि यह सफलता यहां के स्थानीय निवासियों, विद्यार्थियों, फॉरेस्ट विभाग और `मैनग्रोव्स फाउंडेशन’ `सह्याद्रि निसर्ग मित्र’ जैसे एनजीओ के बिना संभव नहीं था। यह सब का मिला जुला प्रयास है। मुंबई से लगभग ढाई सौ किलोमीटर की दूरी पर बसे वेलास नामक गांव से इन कछुओं को बचाने की मुहिम शुरू हुई। महाराष्ट्र, कोकण में रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग और रायगड जिलों के समुद्री तटों पर रिडले कछुओं की मादाएं हर साल नवंबर से अप्रैल महीनों के बीच अंडे देने आती हैं। अंडे देने के लिए यह मादाएं समुद्र तट पर ५० से ८० मीटर दूर १८ से २० इंच गहरे गड्ढे तैयार करती हैं और उसमें एक बार लगभग १०० से अधिक अंडे देकर उन्हें रेत से ढक कर समुद्र में चली जाती हैं।
बता दें कि स्थानीय लोग इन अंडों को खोदकर निकालते थे और उन्हें बाजार में बेच देते थे। अंडों का इस्तेमाल खाने के लिए होता था। उस जमाने में यह बात प्रचलित थी कि कछुए इंसानों के लिए अपने अंडों को छोड़ कर जाते थे ताकि इंसान उन्हें खा सकें। अंडे विशेषकर गर्भवती महिलाओं और गांव में होने वाले बैलों की लड़ाई `बुलफाइट’ में भाग लेनेवाले बैलों को भी खिलाए जाते थे। इन सभी कारणों के चलते कछुओं के अंडे नष्ट हो जाते थे और यह प्रजाति खत्म होने के कगार पर आ पहुंची थी। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। अब कछुओं के अंडों को उन गड्ढों से निकाला तो जाता है लेकिन खाने या उनकी बिक्री के लिए नहीं बल्कि उनके संरक्षण के लिए। उन अंडों को नजदीक के सुरक्षित स्थान `हैचरी’ पहुंचा दिया जाता है। यह अंडे कब दिए गए, कब इन अंडों को सेने के लिए सुरक्षित जगह `हेचरी’ पहुंचाया गया और कब अंडे को फोड़कर यह बच्चे बाहर निकलेंगे इन सभी बातों का तरतीब ब्यौरा रखा जाता है। जैसे ही ये कछुओं के बच्चे अंडों से बाहर निकलते हैं और छोटे-छोटे कदमों से समंदर की ओर सुरक्षित जाने लगते हैं, उस समय एक बहुत बड़ा फेस्टिवल मनाया जाता है जिसे `टर्टल फेस्टिवल’ कहा जाता है। बता दें कि इस गांव का यह बीच अब दुनिया के नक्शे में कछुआ के संवर्धन को लेकर चमकने लगा है। हर साल यहां पर `वेलास टर्टल फेस्टिवल’ मनाया जाता है, जिसमें हिंदुस्थान ही नहीं दुनिया भर के लोग सम्मिलित होते हैं। आलिव रिडले को इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर ने अति संवेदनशील प्रजातियों की श्रेणी में रखा है।

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