मुख्यपृष्ठनए समाचारमहाराष्ट्र की स्वास्थ्य व्यवस्था में भारी भ्रष्टाचार 

महाराष्ट्र की स्वास्थ्य व्यवस्था में भारी भ्रष्टाचार 

– संजय राऊत ने मुख्यमंत्री से की जांच की मांग

– सबूत के साथ गिनाए १० गंभीर भ्रष्टाचार के मामले

सामना संवाददाता / मुंबई

राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था और स्वास्थ्य यंत्रणा भ्रष्टाचार का अड्डा बन गई है। इस भ्रष्टाचार का असर गरीबों को और दलदल में डाल रहा है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) नेता और सांसद संजय राऊत ने मुख्यमंत्री से शिकायत की है। राऊत ने कहा है कि हमें स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के मामलों में काफी सबूत मिले हैं और यह मामला बेहद गंभीर है। राऊत ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार को उजागर किया है और स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार की गहन जांच की मांग की है। उम्मीद जताई है कि राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए संबंधित मंत्रियों और अधिकारियों का पोस्टमार्टम किया जाएगा और उन पर उचित कार्रवाई होगी। संजय राऊत ने दिल्ली में पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार का सिलसिला हर दिन जारी है। पदोन्नति, स्थानांतरण एवं नियुक्तियां यहां नीलामी के माध्यम से की जाती हैं। संचालक, सह संचालक के पद नीलामी के लिए रिक्त हैं। यदि मेरे द्वारा भेजे गए पत्र का उत्तर नहीं दिया गया और कोई ठोस कार्रवाई होती नहीं दिखी तो मैं पूरे मामले का सच जनता के सामने रख दूंगा, इससे जुड़े तमाम बड़े घोटाले भी पेश करूंगा।
संजय राऊत ने अपने पत्र में क्या कहा है 
ड्रग माफिया ललित पाटील मामला सीधे तौर पर स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा है। इसके लिए जितना पुलिस जिम्मेदार है, उतना ही संबंधित विभाग के मंत्री और अधिकारी भी जिम्मेदार हैं। स्वास्थ्य विभाग में अवैध प्रमोशन और ट्रांसफर एक बड़ा उद्योग बन गया है और साफतौर पर देखा जा रहा है कि इस उद्योग के ‘संचालक’ संबंधित विभाग के मंत्री तानाजी सावंत हैं। उन्होंने कहा, ‘माननीय मुख्यमंत्री जी, मेरे पास स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार के पुख्ता सबूत हैं। अपने कार्यालय के जिम्मेदार व्यक्ति का नाम बताएं। मुझे उन्हें सबूत सौंपने में खुशी होगी।’ स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार की गहन जांच होनी चाहिए। इस संबंध में गृहमंत्री पहले ही जांच के निर्देश दे चुके हैं। अनुरोध है कि जांच में तेजी लाई जाए और राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए संबंधित मंत्रियों और अधिकारियों का पोस्टमार्टम करें।
गंभीर हैं ये १० मामले 
१) महाराष्ट्र में कुल १,२०० चिकित्सा अधिकारियों को ‘शामिल’ करने के लिए ४ लाख रुपए यानी कुल ५० करोड़ रुपए एकत्र किए गए और संबंधित मंत्रियों को इससे अवगत कराया गया। उस रिकवरी के लिए एक विशेष ओएसडी नियुक्त किया गया था।
२) यह बहुत गंभीर मामला है कि वर्तमान में निजी अस्पताल महात्मा ज्योतिराव फुले योजना के कार्यान्वयन के लिए प्रति बिस्तर १ लाख रुपए ले रहे हैं। फर्जी बिलों और फर्जी मरीजों पर करोड़ों रुपए संबंधित मंत्रियों तक पहुंचाए जा रहे हैं।
३) स्वास्थ्य विभाग जनता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इस विभाग के दोनों निदेशक पद खाली हो गए हैं और मंत्री इन्हें ‘नीलामी’ पद्धति से निपटाने की योजना बना रहे हैं।
४) भ्रष्टाचार और छाया भ्रम के कारण स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह से सड़ चुका है। ३४ जूनियर अधिकारियों में से १२ को अवैध रूप से सिविल सर्जन के रूप में नियुक्त किया गया था।
५) वाशिम और बुलढाणा जिलों में दो गैर-सीएस कैडर को सिविल सर्जन के रूप में नियुक्त किया गया। इसके पीछे का आर्थिक आंकड़ा लोगों को भी चौंकानेवाला है।
६) महाराष्ट्र लोकसेवा आयोग के माध्यम से १४ उप निदेशकों का चयन किया गया था, लेकिन उनमें से प्रत्येक नियुक्ति के लिए ५० लाख की मांग की गई। यह मांग पूरी न होने पर उन्हें मुंबई-पुणे में सिंगल साइड पोस्टिंग दे दी गई।
७) जिला स्वास्थ्य अधिकारी प्रतापसिंह सारणीकर सूची में १११ वें स्थान पर हैं। हालांकि, उनका नाम उप निदेशकों की सूची में नहीं है।
८) जलगांव में मामले ‘कोविड’ की खरीदारी में अनियमितता होने के कारण डॉ. नागोराव चव्हाण (जिला सर्जन जलगांव) को निलंबित कर दिया गया था, लेकिन मंत्री द्वारा संबंधित ठेकेदार कंपनी को उसी खरीद लेन-देन से १८ करोड़ रुपए वितरित करने का दबाव डाला गया और ३ साल बाद अब इसे प्रशासनिक मंजूरी दे दी गई है।
९) पैसे इकट्ठा करने के लिए उप निदेशक स्तर के एक अधिकारी को विशेष रूप से नियुक्त किया गया है और सारा पैसा संबंधित मंत्री के निजी शिक्षा संस्थान के कार्यालय में जमा किया जाता है।
१०) स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार, विशेषकर महात्मा ज्योतिराव फुले योजना में अवैध गतिविधियों की जांच होनी चाहिए।

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