मुख्यपृष्ठनए समाचार‘घाती' सरकार में स्वास्थ्य व्यवस्था वेंटिलेटर पर डिलिवरी के दौरान ७५ शिशुओं...

‘घाती’ सरकार में स्वास्थ्य व्यवस्था वेंटिलेटर पर डिलिवरी के दौरान ७५ शिशुओं की हुई मौत!

सामना संवाददाता / मुंबई

ठेके पर नियुक्त डॉक्टर कर रहे इलाज  नहीं हैं प्रसूति और बाल रोग विशेषज्ञ

कई दिक्कतों के चलते गर्भवती महिलाओं की नार्मल डिलिवरी न होने की स्थिति में बच्चे और मां को बचाने लिए डॉक्टर सिजेरियन तरीका अपनाते हैं। इसके बावजूद अमरावती जिले में सरकारी महिला अस्पताल (डफरीन) में १० महीनों में ७५ नवजात शिशुओं की मौत हो गई। इतना ही नहीं सिजेरियन पद्धति में भी तीन महिलाओं की मौत से यह बात सिद्ध हो गई कि महाराष्ट्र की स्वास्थ्य व्यवस्था वेंटिलेटर पर है। सबसे चौंकानेवाली बात यह है कि इस सरकारी महिला अस्पताल में न तो प्रसूति डॉक्टर और न ही बालरोग विशेषज्ञ हैं। इसलिए ठेका पर नियुक्त और नई पोस्टिंग पर आए डॉक्टरों पर ही अस्पताल की पूरी जिम्मेदारी है। मरीज और उनके परिजनों का आरोप है कि जब से राज्य की बागडोर ‘घाती’ सरकार के हाथों में गई है, तभी से यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह से बिगड़ गई है। महिलाओं व बच्चों की मौतों को लेकर अस्पताल प्रशासन का कहना है कि अंधविश्वास और पुरानी मान्यताओं के कारण महिलाएं अपनी सेहत को नजरअंदाज करती हैं। इसके अलावा कई मामलों में प्रसव जटिल होने पर ही मरीज को हमारे पास रेफर किया जाता है। मेलघाट जैसे आदिवासी और ग्रामीण इलाकों से महिलाएं प्रसव के लिए जिला महिला अस्पताल आती हैं। विशेषज्ञ डॉक्टर न होने पर शुरू से ही उनकी देखभाल नहीं हो पाती और न ही उन्हें अस्पतालों में भर्ती कराया जाता है।
कमियों को दूर करने का प्रयास
डफरीन के चिकित्सा अधिकारी डॉ. विनोद पवार का कहना है कि जो पहले से ही गंभीर मरीज होते हैं उन्हें डफरिन रेफर किया जाता है। जाहिर तौर पर इसका असर डिलीवरी के दौरान पड़ता है। अब तक ७५ नवजात शिशुओं की मौत हो चुकी है। हमारे पास वैकल्पिक व्यवस्थाएं हैं, फिर भी कुछ कमियां हैं। इन्हें खत्म करने की कोशिशें चल रही हैं।

जन्म के कुछ मिनट बाद ही हुई बच्चों की मौत
जन्म के पहले कुछ मिनट बच्चों के लिए अनमोल होते हैं। जिला महिला अस्पताल में जन्म के कुछ ही मिनटों के भीतर ७५ बच्चों की मौत हो गई है। स्वास्थ्य केंद्रों की कमी के कारण दूरदराज के इलाकों में गर्भवती महिलाओं की अभी भी पर्याप्त देखभाल नहीं की जाती है। हालत गंभीर होने पर उन्हें डफरिन रेफर कर दिया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि किसे बचाया जाए, बच्चे को या मां को। कभी-कभी बच्चा गर्भ में ही मर जाता है।

अन्य समाचार