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ठंडी-ठंडी हवा में दिल लहराए…

कविता श्रीवास्तव

ठंड का मौसम एक बार फिर आरंभ हो गया है और इसी मौसम का साल भर इंतजार रहता है। क्योंकि न बारिश का गीलापन है न तपतपाती धूप का पसीना। इस मौसम में विभिन्न प्रकार के गरमागरम व्यंजनों का लुत्फ उठाने का आनंद भी शुरू हो गया है। इसके साथ ही कंबल, ओढ़नी, स्वेटर जैसे गर्म कपड़ों का खूब मजा भी मिलता है। लेकिन मुंबईवालों को वैसे गर्म कपड़े नहीं पहनने पड़ते, जैसा कि उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों और पर्वतीय राज्यों में पहने जाते हैं। दो दिन पहले ही पतिदेव के लिए नई कमीज लेने बाजार गई थी। वहां तरह-तरह के वस्त्रों के साथ ही इन दिनों मफलर, कनटोप, स्वेटर, जैकेट और ऊनी वस्त्रों की नई खेप आई हुई है। नए पैटर्न के इन गर्म कपड़ों को देखकर मन बहुत प्रसन्न हुआ। बेहद आकर्षक रंग और अनेक नई डिजाइन देखकर उन सबको खरीदने का मन हो रहा था। लेकिन अभी कुछ दिनों पहले ही उत्तराखंड की चारधाम यात्रा से लौटी हूं। वहां बहुत ठंड थी। इसलिए कुछ गर्म कपड़े मैंने वहां खरीदे थे। अब उन्हीं से काम चलेगा क्योंकि मुंबई में आजकल ठंडक के गुलाबी एहसास के साथ ही गर्म वस्त्रों के इस्तेमाल की दरकार भी महसूस होने लगी है। लेकिन इन्हीं दिनों में उत्तरी भारत में शादियों का मुहूर्त भी खूब निकला है। इसलिए ढेर सारी शादियां भी हो रही हैं। जाना तो हमें भी है। इसलिए ठंड का यह ताजा मौसम मुझे उस विवाह की याद दिलाता है, जिसमें हम बनारस पहुंच गए थे। पर हम गर्म कपड़े इसलिए नहीं ले गए थे, क्योंकि हमें उत्तर भारत की ठंडी का अंदाजा नहीं था। मेरी ननद की शादी थी और उसमें मुंबई से पहुंचने वाले हम ही थे। दिन तो गुजर गया। लेकिन शाम होते ही वहां के सभी लोगों ने मफलर, कानटोपी, शॉल और स्वेटर निकाल लिए। उन्हें पहनने के बाद सभी बहुत ही आकर्षक सजे-धजे लग रहे थे। महिलाओं ने एक से एक नए पैटर्न की स्वेटर पहनी हुई थीं। युवा लड़कियां खूबसूरत जैकेट्स और नई ओढ़नी में खूब जंच रही थीं। पुरुषों के ग्रुप में एक से एक मफलर, टोपी, जैकेट, स्वेटर और कोट भी पहने हुए लोग बहुत सुंदर दिख रहे थे। इन सबके बीच हमारा परिवार बिना गर्म कपड़े के पहुंचा था। हमारी हालत दयनीय सी थी, क्योंकि हम मुंबई के मौसम के अंदाज से वहां गए थे। पर वहां की कड़ाकेदार सर्दी ने हमारी सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी। परिजनों ने हमारी समस्या को भांप लिया। सभी के सूटकेसेस में अतिरिक्त प्रबंध थे। हमारे लिए किसी ने मफलर, किसी ने कनटोप तो अन्य ने जैकेट, स्वेटर, शॉल आदि का प्रबंध किया। उसे पहनने के बाद हम ठंड से भी बचे और वैसे वस्त्र पहनकर हमें भी बहुत अच्छा लगा। उस घटना के बाद यह समझ में आ गया कि भले ही हम सालभर मुंबई में रहें, लेकिन ठंडी के दिनों में उत्तरी भारत जाने के लिए अच्छी क्वॉलिटी के स्वेटर, कानटोपी, मफलर, जैकेट हर तरह के गर्म कपड़े हमारे बैग में होने चाहिए। नहीं तो ठंड हमारी जान पर आफत बनेगी ही। साथ ही वह कमी सबके सामने हमें आत्मग्लानि का अहसास भी कराएगी। वैसे भी जम्मू-कश्मीर, हिमाचल या उत्तराखंड के सैर-सपाटे में हम देखते हैं कि नौकर-चाकर भी एक से एक आकर्षक गर्म कपड़े पहनकर चहलकदमी करते हैं। ठंड के दिनों में ही एक विवाह से पहले लड़केवालों के घर में गांव के कुछ गरीब परिवारों के लोग हफ्तों से मेहमानों की सेवा में लगे हुए थे। लगातार काम करने की वजह से उनके कपड़े मैले-कुचैले से रहते थे। जिस दिन बारात जानी थी। उस दिन दोपहर तक तो वे सारे मैले कपड़ों में सक्रिय थे। लेकिन बारात निकलने से ठीक एक घंटा पहले वे सारे काम करनेवाले लड़के नहा-धोकर कोट, जैकेट और जूता पहने सज-धजकर पान का बीड़ा मुंह में घोले ऐसे खड़े हुए मानो वे ही मुख्य बाराती हों। उनमें से एक से किसी ने पानी मांगा तो उसने मना कर दिया और कहा कि कोई काम नहीं करूंगा, अब बारात में जाना है। वे गांव के ही थे। पास-पड़ोस के ही थे। इसलिए वे घर के जैसे ही थे। हफ्तेभर से लगातार दिन-रात काम करने के बाद बाराती बनकर मजा लूटने का उनका अधिकार भी बनता था। उन सभी ने ऐसे शानदार कोट, जैकेट शेरवानी पहनी कि हम भी भौंचक्के रह गए और अपने वस्त्रों की ओर देखने लगे। इससे हमने देखा कि शादी-ब्याह के मामले में गांव-कस्बों के लोगों का कोई जवाब नहीं। उनमें मुंबईवालों से कहीं ज्यादा बढ़-चढ़कर उत्साह और तैयारी होती है। हम लोग तो मुंबई में यूं ही कोई भी ठीक लगने वाला कपड़ा पहनकर शादी-ब्याह में चले जाते हैं। लेकिन उत्तरी भारत में मौसम के अनुसार कपड़े पहनकर सज-धजकर निकलने का अपना ही अंदाज है। खासकर शादी-ब्याह के मामले में वहां के लोग बहुत ज्यादा सलीके से समारोह का हिस्सा बनते हैं। मुझे उत्तर भारत की शादियों में बूढ़े-बुजुर्गों को शानदार शेरवानी, कोट पहने, मफलर लपेटे, जूते चमकाकर पान की गिलोरी खाकर निकलते हुए देखकर उनकी तैयारियों पर ताज्जुब होता है। कई बुजुर्ग जब छड़ी लेकर चलते हैं तो यह लगता है कि कोई रौबदार व्यक्ति आ रहा है। इसीलिए जब-जब ठंडी का मौसम आता है तब ग्रामीण इलाकों के खान-पान के अलावा वहां के लजीज पकवान, मस्त मनभावन गर्म कपड़े और रौबदार अंदाज में जीवन बिताने के सुख का आनंद उठाने का मन होता है। मुंबई की अत्यंत ही व्यस्त, भीड़भरी और भागमभाग की जिंदगी में वैसा सुख संभव नहीं है।

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